भगवती श्रीसीता

सीता-तत्त्व

      कोटिब्रह्माण्डनायिका उमा-रमा-ब्रह्माणी-वन्दिता राजराजेश्वरी सनातन मूल-भगवती ‘सीता’ महारानी ही सर्वलोकों की इष्ट-देवी कही जाती हैं। वह तीनों लोकों की सर्वेश्वरी ‘सीता’ सनातन परब्रह्म परमात्मा सर्वेश्वर भगवान् श्रीराम की प्राणवल्लभा और नित्य-पत्नी हैं। परम-शक्ति सीता हीं ‘श्री’ (मूल श्री-देवी) कही जाती हैं, और उनसे नित्य-युक्त होने के कारण भगवान् को ‘श्रीराम’ कहते हैं। श्रीसंप्रदाय में युगलब्रह्म 'सीता-राम’ की उपासना तीनों लोकों में सर्वप्रसिद्ध है। सीता-तत्त्व वेदों का परम-गोप्य तत्त्व है, ब्रह्मसत्ता का स्वरूप ही सीता-तत्त्व कहा जाता है, अर्थात् सीता स्वयं ब्रह्मस्वरूपा हैं।

श्रुति श्रीसीताजी को ‘भगवती’ (षडैश्वर्य-संपन्ना) और ‘ईश्वरीꣳ सर्वभूतानाम्’ भी कहती है!

कुछ लोग श्रीजी और भगवान् को अलग-अलग मानते हैं, एक को जीवतत्त्व (जीव-कोटि में) और एक को ईश्वर (ब्रह्म) कहते हैं, परन्तु ऐसा सही नहीं है। श्री-संप्रदाय में ब्रह्म की युगलोपासना ही है। ‘सीता’ और ‘राम’ - ये दोनों युगल-ब्रह्म हैं, ये दोनों कहने मात्र को ही भिन्न हैं (कहियत भिन्न), पर स्वरूपतः अभिन्न (न भिन्न) एक ही तत्त्व हैं (कहियत भिन्न न भिन्न), जैसे वाणी और अर्थ (गिरा अरथ) - वाणी से हीं अर्थ की अभिव्यक्ति होती है, दोनों एक ही हैं, जैसे प्रभा के बिना सूर्य नहीं है, और सूर्य से हीं प्रभा है, अर्थात् दोनों अनन्य (एक रूप) हैं।

अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा ॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण ५.२१.१५)

श्रीसीता रावण से अपना स्वरूप कहती हैं —
“मैं श्रीराम से उसी तरह अनन्य (एकरूप) हूँ, जिस प्रकार सूर्य से उसकी प्रभा अनन्य (अपृथक एकरूप) है।”

स्वयं भगवान् श्रीराम भी इसे अग्निदेव से कहते हैं —

अनन्या हि मया सीता भास्करेण प्रभा यथा ॥
(श्रीवाल्मीकि-रामायण ६.११८.१९)

“सीता मुझसे (श्रीराम से) अभिन्न है, अनन्य है, जैसे सूर्य से उसकी प्रभा अभिन्न (एकरूप) होती है, अर्थात सीता और राम सदैव एक हीं हैं।”

देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्का सीता किं रूपमिति । (~ सीतोपनिषद्, २)
देवताओं ने प्रजापति ब्रह्मा से पूछा — श्रीसीता कौन हैं (का सीता)?, उनका क्या स्वरूप है (किं रूपमिति)?

तब प्रजापति ब्रह्मा कहते हैं (स होवाच प्रजापतिः) — सा सीतेति । अर्थात् वह परब्रह्म की शक्ति ‘सीता’ हैं।

सीता इति त्रिवर्णात्मा साक्षान्मायामयी भवेत् ।

“‘सीता’ उनका यह नामात्मक रूप तीन वर्णों (स, ई, त) का है, वे साक्षात् भगवती योगमाया स्वरूपा हैं।”

सीता-तत्त्व के संबन्ध में कहते हुए श्रुति आगे कहती है —

सीता भगवती ज्ञेया मूलप्रकृतिसंज्ञिता।
(सीतोपनिषद्, २)

“सीता को साक्षात् भगवती जानना चाहिए, वह समस्त-प्रकृति की मूल (आश्रय) - मूलप्रकृति कही जाती हैं।”

अ॒स्य ईशा॑ना॒ जग॑तो॒ (कृष्ण-यजुर्वेद ४.४.१२)

“वह इस जगत की शासिका हैं।”


सीताराम युगल ब्रह्म हैं

इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तं वा एतमिन्ध सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः॥ (बृहदारण्यकोपनिषत् ४.२.२)

“(योऽयं) यह जो (दक्षिणे) दाहिनें (अक्षन्) नेत्र में (पुरुषः) पुरुष है, (एषः) यह (इन्धो) इन्ध [देदीप्यमान] (नाम) नाम वाला (ह) प्रसिद्ध है, (तम्) उसे (वै) ही (एतम्) इस पुरुष को (इन्ध) इन्ध [देदीप्यमान] (सन्तं) होते हुए भी (इन्द्र) इन्द्र (इति) इस (परोक्षेणैव) परोक्ष नाम से ही (आचक्षते) ऋषि-ज्ञानी कहते हैं, (हि) क्योंकि (देवाः) देवता परोक्ष से विशेष प्रेम करने वाले के (इव) समान होते हैं!”

‘ञिइन्धी दीप्तौ’ इस धातु से दीप्ति गुण वाले के अर्थ में ‘इन्ध’ शब्द की निष्पत्ति होती है, और ‘राजृ दीप्तौ’ धातु से अतिशय देदीप्यमान के अर्थ में ‘राम’ शब्द है! ‘इरां ददाति’ दानार्थक ‘डुदाञ्’ धातु से ‘इन्द्र’ शब्द बनता है, ‘राति ददाति’ दानार्थक ‘रा’ धातु से भक्तों को उनके सभी मनोवाञ्छित वर भुक्ति-मुक्ति-भक्ति देने वाले परमेश्वर के अर्थ में ‘राम’ शब्द है! ‘इदी परमैश्वर्ये’ से परम-ऐश्वर्यवान् के अर्थ में ‘इन्द्र’ शब्द बनता है, और श्रीराम सम्पूर्ण लोकों के राजा हैं, इस प्रकार ‘इन्द्र’ और ‘राम’ शब्द दोनों पर्यायवाची हैं, इन्द्र शब्द के परम वाच्य सीतापति श्रीराम हीं हैं, अतः भगवान् श्रीराम को रामायण में ‘कोसलेन्द्र’ (~वाल्मीकीये) - कोसल के इन्द्र कहा गया है, जिनका नाम ‘इन्द्र’ - देवताओं में इन्द्र नाम के देवता ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार परब्रह्म जो अभिधावृत्ति से ‘राम’ कहे जाते हैं, वे सर्वव्यापक होने से (मूल-)‘विष्णु’ कहे जाते हैं और जिनका नाम ‘विष्णु’ उनके चतुर्भुज-अवतार विष्णु ग्रहण करते हैं।

अथैतद्वामेऽक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयोरेष सस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं ॥ (बृहदारण्यकोपनिषत् ४.२.३)

“(अथ) दक्षिण नेत्र में परब्रह्म श्रीराम को कहने के उपरान्त अब (एतद्) यह जो (वामे) बायें (अक्षणि) नेत्र में (पुरुषरूप) पुरुषाकार रूप वाली (एषा) यह नारी (अस्य) इस इन्द्र शब्द वाच्य परम देदीप्यमान् परब्रह्म श्रीराम की (विराट्) विशेष रूप से देदीप्यमान् [विशेषेण राजत् इति वि+राट्] (पत्नी) पत्नी ‘सीताजी’ हैं, (तयोः) उन दोनों देदीप्यमान पति-पत्नी सीताराम जी की (एष) यह (सस्तावो) एकान्त संभोग भूमि (य) जो (एषो) यह (अन्तर्हृदय) अन्तः हृदयकमल के मध्य में (आकाशो) आकाश है (एतत्) यह (एनयोः) उन दोनों सीता-राम का (अन्नं) भोग्य स्थानीय है!”

‘राजृ दीप्तौ’ धातु से विशेष रूप से देदीप्यमान ‘विशेषेण राजत् इति विराट् [विराज]’ के अर्थ में ‘विराट्’ शब्द की निष्पत्ति है, उसी प्रकार ‘राजृ दीप्तौ’ से देदीप्यमान के अर्थ में ‘राम’ शब्द है! इन दोनों परम-देदीप्यमान युगल-ब्रह्म ‘सीताराम’ जी की क्रीड़ा-रास भूमि हृदयाकाश है!

प्रश्न उठ सकता है कि वेदों में कहाँ कहा गया है कि इन्द्र कहाने वाले परब्रह्म श्रीराम की पत्नी ‘सीता’ हैं? वस्तुतः ऐसा कई जगह लिखा है, यथा —

इन्द्रपत्नीमुपह्वये सीता सा मेत्वन्नपायिनी भूयात् ॥
(पारस्कर गृह्यसूत्र २.१७.९)

[ऋषि प्रजापति, छन्द पंक्ति, देवता भगवती सीता]
“(सभी वैदिक और लौकिक अनुष्ठानों में जिनकी उपस्थिति होने पर संपूर्ण भौतिक ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है;) मैं उसी इन्द्रकी पत्नी अर्थात् परब्रह्म श्रीराम की पत्नी ‘सीता’ का आह्वान करता हूँ। वे मेरे प्रत्येक अनुष्ठान में अन्न के भण्डार को भर दें!”

इन्द्रः॒ सीतां॒ नि गृ॑ह्णातु॒ तां पू॒षानु॑ यच्छतु ।
सा नः॒ पय॑स्वती दुहा॒मुत्त॑रामुत्तरां॒ समा॑म् ॥
(ऋग्वेद ४.५७.७, अथर्ववेद ३.१७.४)

“(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् श्रीराम (सीतां) श्री सीताको (नि गृह्णातु) ग्रहण करें, और (तां) उन सीता जी को (पू॒षानु॑) पुत्री रूप में पालन-पोषण करने वाले राजा जनक श्रीरामको (अनुयच्छतु) प्रदान करें। (सा) वह सीता जी (नः) हम लोगों को (उत्त॑रामुत्तरां॒ समा॑म्) आनेवाले वर्षों में [अत्यन्तसंयोगे द्वितीया] (दुहाम् - दोग्ध्रीणां मध्ये) कामधेनुवत सुख प्रदान करने वालों में सर्वाधिक सुखरूप (पयस्वती) आनन्द प्रदान करने वाली हों।”

श्रीसीता का संबंध एकमात्र श्रीराम से है, वे श्रीराम की पत्नी हैं, यहाँ इन्द्र शब्द से वाच्य परब्रह्म परमात्मा श्रीराम ही हैं।

जो सत्य-सनातनब्रह्म (सीताराम) सूर्य के केन्द्र [और ब्रह्मज्योतियों से परिवेष्टित परव्योम-साकेत में] विद्यमान हैं, वही भगवान् श्रीराम जीवों के दक्षिण नेत्र और उनकी परमदेदीप्यमान पत्नी ‘सीताजी’ जीवों के बायें नेत्र में भी विद्यमान हैं। वे दोनों ही जीवों के हृदयाकाश में भी हैं। (~ बृहदारण्यक उपनिषद्)

मूल-भगवती सीता सबके अन्दर [सूर्य, जीवों के नेत्र, हृदयाकाश में] प्रविष्ट हैं, सबको व्याप्त कर रही हैं — श्रुति से हीं यह परमगुह्यतम वैदिक सिद्धान्त स्थापित हुआ।

Sita Ji
राजराजेश्वरी भगवती श्रीसीता महारानी


श्रीसीता का सर्वावतारीत्व

   जगत-स्वामिनी सीता भगवान् की पत्नी होने से भी ईश्वरी हैं, और अपने स्वरूप से भी सर्वभूतों की ईश्वरी हैं। परन्तु, जगत के दो शासक तो हो नहीं सकते, अर्थात् वे दोनों एक ही हैं, वो ईश्वर श्रीराम की इच्छारूप हैं, भगवान् की संकल्परूपा हैं, ज्ञानरूपा हैं, समग्र रूप (स्वरूपा होने) से ब्रह्मस्वरूपा (ब्रह्मरूपिणी) हैं, इसलिए भगवती हैं।

जैसे श्रुति परब्रह्म श्रीराम का सर्वावतारीत्व (सर्वरुपित्व) प्रतिपादन करती है, उसी प्रकार ब्रह्मस्वरूपिणी साक्षात्-भगवती सीताजी (स+ ई + त+ आ) का भी सर्वावतारीत्व श्रुति प्रतिपादन करती है —

सा देवी त्रिविधा भवति शक्त्यासना इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिः साक्षाच्छक्तिरिति ।
(सीतोपनिषद्, ५)

“वह सीता देवी जो समस्तशक्तियों की आश्रय हैं वे - १. इच्छाशक्ति २. क्रियाशक्ति ३. साक्षात् शक्ति — इन तीन शक्तियों के रूप में प्रकट होती हैं।”

वह साक्षात्-भगवती सीता ही जीवों के कल्याण की इच्छा से अन्य तीन रूपों लक्ष्मी, भू, और नीला आदि रूपों को प्रकट करती हैं।

इच्छाज्ञानक्रियाशक्तित्रयं यद्भावसाधनम् ।
तद्ब्रह्मसत्तासामान्यं सीतातत्त्वमुपास्महे ॥
(सीतोपनिषद्, १)

“जिनकी प्राप्ति का साधन स्वरूप इच्छा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति, और क्रिया-शक्ति — ये तीन शक्तियां हैं, उस ब्रह्म सत्ता का सामान्य रूप जो सीता-तत्त्व है, हम उनकी उपासना करते हैं!”

अर्थात् ब्रह्म-सत्ता का जो स्वरूप है उस सीता-तत्त्व की हम उपासना करते हैं, अतः श्री-संप्रदाय में सीता-राम रूप युगल-ब्रह्म की हीं उपासना है, केवल 'राम' की नहीं, न केवल 'सीता' की।

वेदावतार श्रीवाल्मीकि रामायण, आदि ग्रन्थों में भी श्रीसीता का सर्वावतारीत्व प्रतिपादन है —

वसुधाया हि वसुधां श्रियः श्रीं भर्तृवत्सलाम् ।
सीतां सर्वानवद्याङ्गीमरण्ये विजने शुभाम् ॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण ६.१११.२४)

“सर्वाङ्गसुन्दरी शुभलक्षणा सीता जी भू-देवी की भी भू-देवी हैं, वे श्री-देवी की भी श्री-देवी हैं।”

वस्तुतः श्रीसीता ही मूल-श्रीदेवी हैं, उनकी अवतार रूपा होने से अन्य जितनी भी देवियाँ जो श्री कहीं जा सकती है, यथा अनन्त लक्ष्मियाँ इत्यादि, उन सबकी भी देवी (अवतारी) स्वरूपा वास्तविक मूल-भगवती श्रीसीता जी हैं।

मूलं सर्वावताराणां स्वयमेव प्रतिष्ठिता॥
(श्री आदि-रामायण)

“श्रीसीता हीं वास्तविक स्वयं भगवती हैं जो अन्य सभी देवियों की मूल (अवतारी) हैं॥”

श्रीरामचरितमानस और श्री आदि-रामायण में भी ऐसा ही कहा गया है —

बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥
(श्रीरामचरितमानस १.१४७.१-२)

“भगवान के बाएँ भाग में सदा अनुकूल रहने वाली, शोभा की राशि जगत् की मूलकारणरूपा आदि शक्ति जानकी सुशोभित हैं। जिनके अंश से गुणों की खान अगणित लक्ष्मी, पार्वती और ब्रह्माणी (त्रिदेवों की शक्तियाँ) उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भौंह के इशारे से ही जगत् की रचना हो जाती है, वही (भगवान की स्वरूपा-शक्ति) भगवती-सीता श्रीराम की बाईं ओर स्थित हैं।”

कोटिब्रह्माण्डलक्ष्मीनामंशिनी ब्रह्मरुपिणी।
आद्या श्रीर्भविता तस्य तोषणार्थ तु जानकी॥
(आदि-रामायण १.९.२)

“जानकी सीताजी स्वयं आदि-श्रीदेवी तथा ब्रह्मरुपिणी हैं, उन्हीं के अंशमात्र से कोटिब्रह्माण्डों की अनन्त-लक्ष्मियाँ उत्पन्न होती है।”

सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण ६.११७.२८)

“हे श्रीराम, श्रीसीता जी लक्ष्मी हैं, [राधा हैं, सरस्वती हैं] और आप श्रीविष्णु हैं, श्रीकृष्ण हैं, प्रजापति ब्रह्मा हैं॥”

अर्थात् भगवान् श्रीराम जब वैकुण्ठ में विष्णु रूप धारण करते हैं, तब सीताजी लक्ष्मी हो जाती हैं। जब श्रीराम गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण रूप धारण करते हैं तब सीताजी राधा हो जाती हैं।

नमोध्यानस्वरूपिण्यैयोगिध्येयात्ममूर्त्तये।
परिणामापरीणामरिक्ताभ्यांचनमोनमः॥
कूटस्थबीजरूपिण्यै सीतायैराघवायच।
सीतालक्ष्मीर्भवान्विष्णुः सीतागौरीभवान्शिवः॥
सीतास्वयंहिसावित्रि भवान्ब्रह्माचतुर्मुखः।
सीताशचीभवान्शक्रः सीतास्वाहानलोभवान्॥
सीतासंहारिणीदेवी यमरूपधरोभवान्।
सीताहिसर्वसम्पत्तिः कुबेरस्त्वंरघूत्तम॥
सीतादेवीचरुद्राणीभवान्रुद्रोमहाबलः।
सीतातुरोहिणीदेवी चन्द्रस्त्वंलोकसौख्यदः॥
सीतासञ्ज्ञाभवान्सूर्यः सीतारात्रिर्दिवाभवान्।
सीतादेवीमहाकालीमहाकालोभवान्सदा॥
स्त्रीलिङ्गेषुत्रिलोकेषुयत्तत्सर्वंहिजानकी।
पुन्नामलांछितंयत्तुतत्सर्वंहिभवान्प्रभो॥
(श्रीपद्म_महापुराण ६.२४३.३०-३६)

“हे श्रीराम! ध्यान के स्वरूप, योगियों के ध्येय स्वरूप, सबके परिणाम स्वरूप (कारणस्वरूप) और परिणाम रहित (कारणरहित / परमकारण स्वरूप परात्पर-ब्रह्म) आपको नमस्कार है। आप सीता और राम कूटस्थ (ब्रह्म, आत्म-तत्त्व), और बीजस्वरूप (सबके कारणस्वरूप) हैं। (किस प्रकार आप दोनों सबके बीज-स्वरूप हैं, तो आगे कहते हैं —) सीता लक्ष्मी हैं, आप विष्णु हैं। सीता गौरी हैं, और आप शिव हैं। सीता स्वयं सावित्री हैं, आप चतुर्मुख ब्रह्मा हैं। सीता शची (इन्द्राणी) हैं, आप शक्र (इन्द्र) हैं। सीता स्वाहा-देवी हैं, आप अग्नि-देव हैं। सीता संहारिणी-देवी हैं, आप यम रूप धारण करने वाले हो। सीता सम्पूर्ण संपत्ति हैं, आप कुबेर हैं। हे रघुओं में श्रेष्ठ श्रीराम ! सीता देवी रुद्राणी हैं, आप महाबलशाली रुद्र हैं। सीता देवी रोहिणी हैं, आप संसार को सुख देने वाले चन्द्रमा हैं। सीता संज्ञा हैं, आप सूर्य हैं। सीता रात्रि हैं, आप दिन हैं। सीता देवी महाकाली हैं, आप नित्य महाकाल हैं। (वस्तुतः) तीनों लोकों में जो कुछ भी स्त्रीलिंग-स्वरूप है वह सीता हैं और जो कुछ भी पुल्लिंग है वह आप हैं।”


स्वरूप निरूपण

भगवान् की चिन्मयता (ब्रह्मस्वरुपता), ब्रह्मस्वरूपिणी उनकी महाद्युति (दिव्य प्रभा स्वरूपिणी) ही उनकी 'श्री' है जो उनसे कभी विलग नहीं होती, अनन्या हैं अर्थात् उनमें और श्रीभगवान् में तनिक भी अंतर नहीं हैं, वे भगवान् की स्वरूपा-शक्ति हैं इसलिए 'श्रीराम' ऐसा ही कहते हैं।

जैसे श्रीराम स्वरूपतः सबको व्यापने से सर्वव्यापक (विष्णु नाम से कहे जाते) हैं, उसी प्रकार साक्षात् भगवती सीता भी स्वरूपतः सर्व्यापक हैं —

अ॒हं द्यावा॑पृथि॒वी आ वि॑वेश ॥ (ऋग्वेद १०.१२५.०६)

“मैं (साक्षात् भगवती सीता) द्यावापृथिवी को भलीभाँति व्याप्ती हूँ॥

कैसे व्याप्ती हैं? तो कहती हैं अपने शरीर से हीं व्याप्ति हूँ —

ततो॒ वि ति॑ष्ठे॒ भुव॒नानु॒ विश्वो॒तामूं द्यां व॒र्ष्मणोप॑ स्पृशामि ॥ (ऋग्वेद १०.१२५.०७)

“(ततः-विश्वा भुवना) तत एव सारे लोकलोकान्तरों को (अनु वि तिष्ठे) व्याप्त होकर रहती हूँ (इत उ द्याम्) इसी कारण द्युलोक को (वर्ष्मणा) वर्ष्म अर्थात् अपने शरीर से (उप स्पृशामि) स्पर्श करती रहती हूँ, अर्थात् समस्त जगत को अपनी आत्मा से स्पर्श किये हुए हूँ॥७॥”

सीताजी कोई धर्मभूत ज्ञान से नहीं व्याप्ती हैं, वरन् अपने चिन्मय शरीर से हीं सबके अन्दर में व्याप्त हो रही हैं।

अतः गोस्वामी श्रीतुलसीदास जी भी श्रीरामचरितमानस में कहते हैं —

अंतरजामी रामु सिय । (श्रीरामचरितमानस २.२५६)

“भगवान् श्रीराम और सीता दोनों हीं अन्तर्यामी हैं॥२५६॥”

दोनों हीं सबके अन्दर व्याप्त हैं!

“मैं (सर्वावतारी साक्षात् भगवती सीता) हीं रुद्रों, आदित्यों, वसुओं, विश्वदेवों, वरुण, सूर्य, अग्नि, विद्युत्, द्युलोक-पृथिवीलोक, इत्यादि सबको धारण करती हूँ।” (~ऋग्वेद १०.१२५.०१)

अ॒हं राष्ट्री॑ सं॒गम॑नी॒ वसू॑नां चिकि॒तुषी॑ प्रथ॒मा य॒ज्ञिया॑नाम् ।
(ऋग्वेद १०.१२५.०३)

“मैं हीं सब जगत की महारानी (स्वामिनी) हूँ, सबको धन प्रदान करने वाली हूँ, तथा यज्ञ द्वारा पूज्यनीय देवों में प्रथम (प्रथम आचार्य रूपा) हूँ।”

अ॒हं राष्ट्री॑ (~ऋग्वेद १०.१२५.०३) — “मैं हीं सब जगत की (राष्ट्री॑) महारानी हूँ, अर्थात् त्रिपाद्विभूति और लीलाविभूति दोनों की सम्राज्ञी महारानी राजकिशोरी हूँ।

सीताजी क्यों प्रथम आचार्य रूपा हैं, वे कहती हैं —

अ॒म॒न्तवो॒ मां त उप॑ क्षियन्ति श्रु॒धि श्रु॑त श्रद्धि॒वं ते॑ वदामि ॥
(ऋग्वेद १०.१२५.०४)

“जो (राक्षस) मुझे नहीं मानते, वो नष्ट हो जाते हैं, हे श्रुत (पुत्र हनुमान) तुम सुनो! मैं तुम्हें श्रद्धेय ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) को कहती हूँ।”

अ॒हमे॒व स्व॒यमि॒दं व॑दामि॒ ॥ (ऋग्वेद १०.१२५.०५)

“मैं हीं स्वयं से इस श्रद्धेय ज्ञान का उपदेश करती हूँ।”

अर्थात्, जीवों में प्रथम बार इस ज्ञान का तुम्हें ही उपदेश कर रही हूँ, तुम मेरे प्रथम शिष्य हुए।

कहाँ उपदेश किया है? श्री मैथिलिमहोपनिषद् में हनुमानजी को मन्त्रराज और ब्रह्मज्ञान प्रदान करती हैं, अध्यात्मरामायण आदि में भी हनुमानजी को उन्होंने ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया है, वाल्मीकीय में रावण को उपदेश करती हैं कि मेरे पति हीं तीनों लोकों के देव (ईश्वर) हैं। वे ही ऋषियों और महाराज जनक को ब्रह्मज्ञान प्रदान करने वाली हैं।

यं का॒मये॒ तंत॑मु॒ग्रं कृ॑णोमि॒ तं ब्र॒ह्माणं॒ तमृषिं॒ तं सु॑मे॒धाम् ॥
(ऋग्वेद १०.१२५.०५)

“मैं जिसे चाहती हूँ अपने उपदेश से उसे ब्रह्मा बनाती हूँ, ऋषि बनाती हूँ , उसे अति बुद्धिमान बनाती हूँ।”

Śrī Sītā blessed Gosvāmi Tulasīdāsa
श्रीसीताजी की कृपाकटाक्ष को पाकर कलिकाल में परम श्रीरामभक्त गोस्वामी तुलसीदास जी आदिकवि महर्षि वाल्मीकि समान ही हो गए


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॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥