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श्रीराम नाम की सर्वोत्कृष्टता

भगवद् श्रीरामानन्द अपने ग्रन्थरत्न ‘श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर’ में श्रीराम-मन्त्र की सर्वोत्कृष्टता को प्रकट करते हुए कहते हैं कि व्यापक और अव्यापक सभी मन्त्रों से 'राम' यह व्यापक मन्त्र अति-श्रेष्ठ है —

मन्त्राणां व्यापकानां भगवत इह चाव्यापकानान्तु मध्ये
ऽतिश्रेष्ठो व्यापकः स श्रुतिमुनिसुमतः शिष्टमुख्यैर्गृहीतैः।
नित्यानामश्रयोऽयं परितउरुशुभो राममन्त्रः प्रधानः
प्राप्योऽथ प्रापकश्च प्रचुरतरगुणज्ञानशक्त्यादिकानाम् ॥
(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर २.२)

“व्यापक और अव्यापक — इन दोनों प्रकार के भगवन्मन्त्रो के बीच श्रीराम-मन्त्र अतिश्रेष्ठ है, ऐसा वेदों और मुनियों द्वारा सुसम्मत है। यह शिष्ट सदाचारसंपन्न महापुरुषों द्वारा गृहीत (धारण किया गया) है। यह शिव, आञ्जनेय आदि नित्यमुक्तों का आश्रय है। सर्वमङ्गलप्रदायक समस्त मन्त्रों में परम प्रधान है। यह सदगुरुओं से प्राप्य और भक्ति-कैङ्कर्य-ज्ञान-शक्ति आदि योग्य-गुणों के सहित भगवद् स्वरूप को प्राप्त कराने वाला है।”

यदि जिज्ञासा उठे कि व्यापक और अव्यापक समस्त भगवन्मन्त्रों के बीच श्रीराम-मन्त्र क्यों श्रेष्ठ है? तो कहते हैं कि श्रुति और नारद-अगस्त्य-वशिष्ठ आदि परम श्रेष्ठ ऋषि-मुनि ऐसा हीं उपदेश करते हैं। इसके आगे कहते हैं कि इस ‘राम’ नाम में समस्त वेदार्थ और प्रणव ‘ॐ’ प्रतिष्ठित है!

वेदों में स्पष्ट रूप से ऐसा कहाँ कहा गया है? श्रीरामतापनी श्रुति में कहा गया है कि गाणपत्य-शैव-शाक्त-सौर तथा वैष्णव-मन्त्रों में भी, समस्त मन्त्रों में श्रीराम-मन्त्र श्रेष्ठ है। यहाँ स्वयं भगवद् श्रीरामानन्द द्वारा श्रीरामतापनी आदि श्रुतियों की परम प्रमाणिकता भी सुनिश्चित हो जाती है।

श्रुति में ऐसा कहाँ कहा गया है कि ‘राम’ नाम में ‘ॐ’ विद्यमान है? तो इसका उत्तर है - ऋग्वेद तथा श्रीरामरहस्योपनिषद् में।

र + ॐ ≅ राम्

अव्यापक मन्त्र यथा - नरसिंह, वाराह, शिव, आदि के मन्त्र। श्रीनारायण, श्रीविष्णु, श्रीवासुदेव मन्त्र आदि श्रेष्ठ व्यापक मन्त्र हैं, इन सबसे भी ‘राम’ मन्त्र अतिश्रेष्ठ है!


व्यापक-मन्त्र

राम, ॐ, नारायण, विष्णु, वासुदेव आदि ये प्रसिद्ध व्यापक मन्त्र हैं, यथा —

राम — ‘रमते सर्वेषु सर्वभूतेषु सर्वलोकेषु इति रामः’ - जो सभी में, घट-घट सर्वभूत-पदार्थो में सर्वव्याप्त हैं, सर्वलोकों-सर्वभूतों में रम रहें हैं विद्यमान हैं, वह राम हैं! वाल्मीकीये दृष्यसे सर्वभूतेषु सर्वासु इति । / वाल्मीकीये ‘लोकरामः’, ‘जगत्सर्वं शरीरं ते’ - रमन्ते लोका यस्मिन् स रामः - समस्त लोक जिसमें रमते/बसते हैं, वह राम हैं।

ॐ — ‘अव प्रवेशने’ से जो सबमें प्रविष्ट हैं, सर्वव्याप्त हैं, वह सर्वव्यापक परमात्मा 'ॐ' शब्द वाच्य हैं। ॐ इति इदं सर्वं (~तैत्तिरीये)

विष्णु — ‘विष् प्रवेशने/व्यापने’ के अर्थ में जो सर्वव्याप्त हैं उन्हें विष्णु कहते हैं।

वासुदेव — ‘वसनात् वासुत्वाद् वासुदेवः’ जो सभी में बसता (वसति) है, और सभी जिनमें बसते हैं, वह वासुदेव हैं।

नारायण — ‘नराणां समूहो नारं जीवसमूहः तत्रायनं निवासस्थानं यस्य स नारायणः’ नरों का समूह जीव-समूह को नार करते हैं, उन सबके निवास स्थान / आश्रय होने के कारण, वह नारायण (कहे जाते) हैं।

इस प्रकार, राम, ॐ, विष्णु, वासुदेव, नारायण वस्तुतः एक हीं परब्रह्म श्रीराम के नाम हैं।

जब उपरोक्त सभी भगवन्नामों का ‘सर्वव्यापक’ ऐसा अर्थ है, तब ‘राम’ नाम समस्त व्यापक मन्त्रों में अतिश्रेष्ठ किस प्रकार से है?

वस्तुतः ‘राम’ नाम में ‘ॐ’ प्रतिष्ठित है, ॐ का भी कारण स्वरूप श्री ‘राम’ नाम हैं। ऐसी विशेषता अन्यत्र नहीं दिखती। इस ‘राम’ नाम से परब्रह्म का अभिधावृत्ति से कथन होता है।

‘राम्’ बीज भी प्रणव कहा जाता है, अतः राम-मन्त्र में जाप के समय ‘ॐ’ पूर्व में नहीं लगाया जाता, क्योंकि कारण (राम्) से पहले कार्य (ॐ) नहीं आता है, परन्तु नारायण / वासुदेव / विष्णु आदि सभी मन्त्रों में प्रणव ‘ॐ’ पूर्व में लगाकर जपते हैं।


श्रीरामनाम में सर्वकारणत्व

जैसे श्रीराम में सर्वावतारीत्व (सर्वकारणत्व) हैं (सर्वेषां अवताराणां अवतारी रघुत्तमः), उसी प्रकार राम नाम में भी सर्वावतारीत्व (सर्वकारणत्व) का श्रुति प्रतिपादन करती है —

यथैव वटबीजस्थः प्राकृतश्च महाद्रुमः ॥
तथैव रामबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ।
रेफारूढा मूर्तयः स्युः शक्तयस्तिस्र एव चेति ॥
(श्रीरामतापिन्युपनिषद्)

“(सर्वकारणत्व) जैसे वटबीज में विशाल वटवृक्ष स्थित (निहित) है, उसी प्रकार राम बीज में समस्त चराचर जगत स्थित है। (सर्वावतारीत्व) समस्त भगवद्-स्वरूप (मूर्तयः) तथा तीन शक्तियाँ (स्वाभाविकी [आह्लादिनी-शक्ति], ज्ञान [संवित्-शक्ति], और क्रिया [संधिनी-शक्ति]) भी राम नाम में स्थित हैं।”

नारायणं नारसिंहं वासुदेवं वाराहं तत्सर्वान् मन्त्रान् ... प्रणवमेतान् रामस्याङ्गानि जानीथाः।
(~ रामरहस्योपनिषद्)

श्रीहनुमान जी विष्णुभक्तों से कहते हैं — “सभी भगवद्-स्वरूप नारायण, नारसिंह, वासुदेव, वाराह .. तथा इन भगवद् स्वरूपों के सभी मन्त्र (यथा, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)... ॐ, इत्यादि — ये सभी भगवान् श्रीराम के अंश हैं, ऐसा जानिए।”

रामनामांशतो जाता ब्रह्माण्डाः कोटिकोटिशः ।
रामनाम्नि परे धाम्नि संस्थिता स्वामिभिस्सह ॥
स्वाभाविकी तथा ज्ञानक्रियाद्याः शक्तयः शुभाः।
रामनामांशतो जाताः सर्वलोकेषु पूजिताः ॥
(पद्म-पुराण)

श्रीपद्म-महापुराण में श्रीवेदव्यासजी ऋषियों से कहते हैं —
“ अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड श्रीराम नाम के अंश से उत्पन्न होते हैं। श्रीराम नाम रूपी सर्वोत्कृष्ट परम तेजःस्वरूप [परम-धाम] में उसी नाम के अंश से उत्पन्न एवं सर्वलोक पूजित स्वाभाविकी [आह्लादिनी-शक्ति], ज्ञान [संवित्-शक्ति], और क्रिया [संधिनी-शक्ति] आदि भगवान् की स्वरुपभूता समस्त मङ्गलमयी शक्तियाँ अपने स्वामियों के साथ विराजमान हैं।”

नामचिन्तामणी रामश्चैतन्यपरविग्रहः ।
पूर्ण शुद्धो नित्ययुक्तो न भेदो नामनामिनः ॥
(पद्म-पुराण)

श्रीपद्म-महापुराण में भगवान् शंकर पार्वतीजी से कहते हैं —
“श्रीरामनाम महाराज चिन्तामणि हैं अर्थात् चिन्तनमात्र से समस्त अभीष्ट पदार्थों को प्रदान करने वाले हैं तथा श्रीरामजी साक्षात् सच्चिदानन्दस्वरूप हैं दोनों पूर्ण पवित्र एवं नित्ययुक्त हैं नाम और नामी में भेद नहीं है।

नायनाय यदृतेऽक्षराष्टकं पञ्चकं च न शिवाय यद्विना । मुक्तिदं भवति यद्द्वयोर्वशात्तद्द्वयं वयमुपास्महे किल ॥ (शुकसंहिता)

“श्रीरामनाम के ‘रा’ शब्द के बिना अष्टाक्षर मन्त्र नायणाय एवं ‘म’ के बिना पञ्चाक्षर मन्त्र ‘न’ शिवाय होकर अभीष्ट फल नहीं देते हैं तात्पर्य यह है कि श्रीरामनाम के ‘रा’ के कारण ही नारायण मन्त्र एवं ‘म’ के कारण ही शिव का पञ्चाक्षर मन्त्र अभीष्ट अर्थ प्रदान करता है मुक्ति प्रदान करता है इसलिए हमें निश्चित ही श्रीरामनाम की उपासना करनी चाहिए।”

गाणपत्येषु शैवेषु शाक्तसौरेष्वभीष्टदः ।
वैष्णवेष्वपि सर्वेषु राममन्त्रः फलाधिकः ॥
गाणपत्यादि मन्त्रेषु कोटिकोटिगुणाधिकः।
(~ श्रीरामतापनी उपनिषद् / अगस्त्यसंहिता / नारद-पुराण)

“गाणपत्य, शैव, शाक्त, सौर, तथा वैष्णव मन्त्रों से भी, समस्त मन्त्रों (ॐकार आदि) से श्रीराम मन्त्र अधिक फलदायी हैं। (कितने श्रेष्ठ हैं? तो श्रुति कहती है) गाणपत्यादि (गाणपत्य, शैव, शाक्त, सौर, और वैष्णव मन्त्रों से) श्रीराम-मन्त्र कोटि-कोटि (अर्थात् अनन्त) गुणा श्रेष्ठ हैं।”

यह श्रुति, तथा नारद, वाल्मीकि, अगस्त्य, वशिष्ठ, व्यास, शुकदेव, आदि महर्षियों का ऐसा सुमत है।

अतः समस्त व्यापक और अव्यापक मन्त्रों से श्रीराम-मन्त्र अतिश्रेष्ठ है।


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॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥