भगवान् श्रीराम और भगवान् श्रीविष्णु

प्रायः ऐसे प्रश्न किये जाते हैं कि श्रीराम कौन हैं, क्या वे नारायण विष्णु हैं, अथवा विष्णु के अवतार हैं? इनमें से मूल तत्त्व 'परब्रह्म' कौन हैं?

परब्रह्म श्रीराम एक ही हैं, वही कार्य-कारण भेद से अनन्त (भिन्न-भिन्न विष्णु, नारायण, आदि) रूपों वाले हो जाते हैं, परन्तु उनमें तात्त्विक रूप से कोई अंतर नहीं होता, केवल नाम-रूप-लीला में ही भेद होता है, यही वैदिक सिद्धांत है।

श्रीराम कौन हैं, इसके संबन्ध में कहते हुए श्रुति कहती है —

रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परंब्रह्माभिधियते ॥
(श्रीरामपूर्वतापनीय उपनिषद् १.६)

“जिस अनन्त, नित्यानन्द, और चिन्मय परमात्म तत्त्व में योगी रमण करते हैं, उसी ‘राम’ पद से परब्रह्म का अभिधावृत्ति से कथन होता है, अर्थात् श्रीराम ही स्वयं परमब्रह्म हैं।”

श्रीराम ही परम-प्राप्य तत्त्व हैं, जिनमें सभी रमण करना चाहते हैं!

परमपुरुष श्रीराम के बारे में वेद, उपनिषद्, इतिहास (रामायण, महाभारत), पुराण आदि ग्रन्थों से ज्ञान होता है। इनमें वेद स्वतः प्रमाण कहे जाते हैं, उन्हीं वेदों के अवतार स्वरूप वेदावतार आदि-काव्य श्रीरामायण है।


श्रीरामायण वेदों के अवतार ही है

वेदवेद्ये परेपुंसि जाते दशरथात्मजे ।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना ॥
तस्माद्रामायणं देवि! वेद एव न संशयः ॥
(अगस्त्य संहिता; मङ्गलाचरण, श्रीमद्वाल्मीकि रामायण)

भगवान् शिव पार्वती जी से कहते हैं —
“वेदों द्वारा वेद्य परमब्रह्म (श्रीराम) ही जब दशरथ के पुत्र के रूप में अवतीर्ण होते हैं, तब सम्पूर्ण वेद ही प्राचेतस् महर्षि के मुख से साक्षाद् रामायण के रूप में अवतीर्ण होते हैं, इसलिए हे देवि! श्रीरामायण वेद (वेदों के अवतार) ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।”

रामचरितं वेदैः सम्मितम् ॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण १.१.९८)

“श्रीरामचरित (श्रीरामायण) वेदों के समान ही है।”

श्रीमद्वाल्मीकि रामायण का प्रत्येक श्लोक वेदों और उपनिषदों के मन्त्रों में दिख जाता है, इसलिये श्रीरामायण वेदावतार ही हैं, वेदों के समान ही है, इसमें कोई संशय नहीं।

न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।
कुरु रामकथां पुण्याम् श्लोकबद्धां मनोरमाम् ॥
(श्री वाल्मीकि रामायण १.२.३५)

ब्रह्मा जी महर्षि वाल्मीकि को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं —
“हे महर्षि! इस रामायण काव्य में आपकी कोई भी वाणी (शब्द) झूठ नहीं होगी, इसलिए आप श्रीरामजी की परमपवित्र और मनोरम कथा को श्लोकबद्ध करके लिखिए।”

वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥
(श्री वाल्मीकि रामायण १.४.६)

“श्रीमद् वाल्मीकि रामायण की रचना (महर्षि वाल्मीकि द्वारा) वेदों के उपबृंहण (सही-सही अर्थों को प्रकट करने) हेतु ही किया गया है।”

इसलिए वेद-मन्त्रों के सही-सही अर्थ का ग्रहण वेदावतार श्रीमद् वाल्मीकि रामायण के प्रकाश में करना चाहिए।

जैसे वेदावतार श्रीरामायण के आदि-मध्य-अंत में सर्वत्र श्रीराम ही प्रतिष्ठित हैं, अर्थात् जैसे श्रीरामायण के प्रतिपाद्य एकमात्र भगवान् श्रीराम ही हैं, उसी प्रकार वेदो और उपनिषदों के भी प्रतिपाद्य वही श्रीराम हैं, ऐसा सुनिश्चित हुआ। उन्हीं परमपुरुष श्रीराम को वेदों में ऋषियों ने अनेकों नामों से कहा है!

ऋषियों की वाणी दिव्य एवं रहस्य युक्त गूढ़ होती है, वे उन्हीं परमब्रह्म श्रीराम को परोक्ष रूप से कहते हैं -

परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियं । (श्रीमद्भागवत ११.२१.३५)

“ऋषि परोक्षवादी होते हैं अर्थात् परम सत्य को गुप्त रूप से कहते हैं, और परोक्ष रूप से कहा जाना मुझ परमात्मा को भी प्रिय है।”

श्रुति भी यही कहती है कि भगवान् को परोक्ष (गुप्त) रूप से कहा जाना हीं प्रिय है।

परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः॥ (बृहदारण्यकोपनिषत् ४.२.२)

“महनीय देव (भगवान्) को परोक्ष (गुप्त) रूप से कहा जाना हीं प्रिय है।”


एक ही देव हैं

वस्तुतः एक ही देव (परब्रह्म परमात्मा श्रीराम) हैं -

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। (श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.११)

“एक ही [परम] देव [परमात्मा श्रीराम] हैं जो सभी प्राणियों में गूढ (छिपे हुए) हैं, क्योंकि ‘वही’ सर्वव्यापी एवं समस्त प्राणियों के ‘अन्तरात्मा’ हैं।”

रमते सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च। अन्तरात्मस्वरूपेण यच्च रामेति कथ्यते॥ (स्कन्द पुराण ६.२५५.४६)

शिवजी पार्वती जी से कहते हैं —
“जो सम्पूर्ण भूतों तथा समस्त स्थावर-जंगम के भीतर अंतरात्म स्वरूप से व्याप्त हो (रम) रहे हैं, वह ‘राम’ कहे जाते हैं।”

यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः। यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति। एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः॥ (बृहदारण्यकोपनिषत् ३.७.१५, शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.२०)

“(यः) जो [वह परब्रह्म श्रीराम] (सर्वेषु) समस्त (भूतेषु) भूतों में (तिष्ठन्) रहता हुआ (सर्वेभ्यः) सम्पूर्ण (भूतेभ्यः) भूतों के (अन्तरो) अन्दर प्रविष्ट है (यम्) जिसको (सर्वेषु) समस्त (भूतानि) भूत (न) नहीं (विदुः) जानते हैं, (यस्य) जिसके (सर्वाणि) समस्त (भूतानि) भूत (शरीरं) शरीर हैं, (यः) जो (सर्वाणि) समस्त (भूतानि) भूतों को (अन्तरो) भीतर रहकर (यमयति) नियमन करता है, (एष) यही [वह] (अन्तर्यामी) अन्तर्यामी (त) तुम्हारा (अमृतः) अविनाशी (आत्मा) आत्मा है। (इति) इस प्रकार (अधिभूतम्) अधिभूत अन्तर्यामी कहा जाता है।”

दृश्यसे सर्वभूतेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥
दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु नदीषु च ।
(श्रीवाल्मीकि रामायण ६.११७.२१)

“(दृश्यसे सर्वभूतेषु) हे श्रीराम! आप ही समस्त भूतों के भीतर में दिखते हैं (यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो, यं सर्वाणि भूतानि न विदुः, यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं ~ बृहदारण्यकोपनिषत् ३.७.१५, शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.२० — जो सभी भूतों के अन्दर विद्यमान [शरीरी] हैं, जिसे वे सभी भूत नहीं जानते, सभी भूत उनके शरीर हीं हैं।), (दिक्षु सर्वासु) समस्त दिशाओं के भीतर भी आप ही दिखते हैं (यो दिक्षु तिष्ठन्दिग्भ्योऽन्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं ~ बृहदारण्यकोपनिषत् ३.७.१०, शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.१४ — जो समस्त दिशाओं के अन्दर विद्यमान है, जिसे दिशाएँ नहीं जानती, सभी दिशाएँ उनकी शरीर हीं हैं।), (गगने) आप ही आकाश के भीतर दिखते हैं (य आकाशे तिष्ठन्नाकाशादन्तरो यमाकाशो न वेद यस्याकाशः शरीरं ~ बृहदारण्यकोपनिषत् ३.७.१२, शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.१० — जो सर्वत्र व्यापी आकाश के अन्दर विद्यमान है, जिसे स्वयं आकाश नहीं जानता, आकाश भी उनका शरीर हीं है।), इत्यादि।”

य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्य आत्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः॥ (शतपथ-ब्राह्मणम् १४.५.३०)

“(य) जो [वह परब्रह्म श्रीराम] (आत्मनि) आत्मा में अर्थात् जीवात्मा में (तिष्ठन्) रहता हुआ (आत्मनो) जीवात्मा के (अन्तरो) भीतर प्रविष्ट है, (यम्) जिसको (आत्मा) जीवात्मा (न) नहीं (वेद) जानती है, (यस्य) जिसका (आत्मा) जीवात्मा (शरीरं) शरीर है, (यः) जो (आत्मानम्) जीवात्मा के (अन्तरो) भीतर रहकर (यमयति) नियमन [शासन] करता है, (स) वह (अन्तर्यामी) अन्तर्यामी (त) तुम्हारा (अमृतः) अमृतत्वशाली अविनाशी (आत्मा) आत्मा है।”

जगत्सर्वं शरीरं ते। (श्रीवाल्मीकि रामायण ६.११७.२६)

“हे भगवान् श्रीराम! (समस्त आत्माओं से लेकर, प्राण, मन, समस्त दिशाएँ, आकाश, अग्नि, वायु आदि चराचर) सम्पूर्ण जगत (ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है) आपका शरीर ही है!”


एको॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॑ ॥ (ऋग्वेद ६.३६.४)

“वे परब्रह्म (श्रीराम) सम्पूर्ण विश्व (ब्रह्माण्ड) के एकमात्र ‘राजा’ हैं।”

भगवान् के सभी रूपों में श्रीराम राजा रूप हैं, उन्हें सम्पूर्ण लोकों का एकमात्र राजा कहा गया है यथा -

राजा सर्वस्य लोकस्य ॥ (श्री वाल्मीकि रामायण ५.३४.२९)

वे श्रीराम ‘सर्व लोकों के ईश्वर’ (सर्वलोकेश्वरः ~ श्रीवाल्मीकीये) हैं, अर्थात् त्रिपाद्विभुति तथा लीला-विभूति दोनों विभूतियों के नायक सर्वेश्वर हैं!


ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम्‌। तदेषाऽभ्युक्ता। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्‌ । सोऽश्नुते सर्वान्‌ कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् २.१.१)

“ॐ [से ब्रह्म का निर्देश किया जाता है] । (ब्रह्मवित्) ब्रह्म को जानने वाला (परम्) ‘परम तत्त्व’ स्वरूप परब्रह्म [एवं परब्रह्मके लोक परमधाम अपराजिता पुरी अयोध्या] को (आप्नोति) प्राप्त करता है; (तत् एषा अभ्युक्ता) क्योंकि प्राचीन ऋचाओं में उस ब्रह्म की महिमा में यही कथन है कि - (सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म) ‘ब्रह्म’ सत्य-स्वरूप (अर्थात् विकार-रहित सत्-स्वरूप), ज्ञान-स्वरूप (अर्थात् नित्य असंकुचित ज्ञानवाला और ज्ञानमय चित्-स्वरूप) तथा अनन्त (देश-काल-वस्तु अपरिच्छिन्न सर्वदेशव्यापी अनन्त स्वरूप) हैं। (यो वेद निहितं गुहायां) जो पुरुष अपने हृद्गुहा में निहित उस परब्रह्म को [उपासना करके] जान लेता है, वह (परमे व्योमन्‌) परम व्योम [श्रीसाकेत अयोध्या] में उन्हें साक्षात् प्राप्त करता है। (सह ब्रह्मणा विपश्चितेति) [साकेत में] परब्रह्म [श्रीराम] के साथ विराजता हुआ (सः) वह ‘ब्रह्मविद्’ (सर्वान्‌ कामान्) अपनी समस्त कामनाओं को (अश्नुते) परितृप्त करता है।”

उपरोक्त उपनिषद् वचन से कई सिद्धांत स्पष्ट होते हैं -
१. जीव ब्रह्म नहीं है, [अर्थात् जीव ब्रह्म का शरीर तो है, परन्तु स्वरूप से ब्रह्म नहीं है,] क्योंकि कहा गया है ब्रह्मविदाप्नोति परम् - ब्रह्म को जानने वाला परम [श्रीराम] को प्राप्त होता है, अर्थात् जीव और परम तत्त्व ब्रह्म दो अलग-अलग तत्त्व हैं; जीव ब्रह्म को जानता नहीं है, वह स्वयं अपनी आत्मा को भी नहीं जानता, इसलिए संकुचित ज्ञान वाला है, जबकि ब्रह्म सत्यं ज्ञानमनन्तं हैं, ज्ञान स्वरूप हैं, उनका ज्ञान संकुचित नहीं होता, तथा वे स्वरूपतः सत्-चित्-आनन्द और अनन्त अर्थात् देश-काल-वस्तु अपरिच्छिन्न सर्वदेशव्यापि हैं।
२. मुक्ति के बाद भी जीव ब्रह्म नहीं होता, क्योंकि (परमे व्योमन्‌ सह ब्रह्मणा विपश्चितेति) परम व्योम में वह ब्रह्म के साक्षात् [अभिव्यक्ति] रूप परब्रह्म के साथ (सह) रहता है!
३. ब्रह्म साक्षात् स्वरूप से परम व्योम में विराजित हैं‌। (वेदों और उपनिषदों में साक्षात् स्वयं ब्रह्म की नगरी अर्थात् परमपद परमव्योम का नाम अपराजिता पुरी अयोध्या है, जहाँ द्विभुज स्वरूप में पूज्यनीय [यक्ष] परब्रह्म परमात्मा श्रीराम रहते हैं - विशेष अध्ययन के लिए यहाँ ‘साकेत लोक’ पृष्ठ देखें‌।)
४. (निहितं गुहायां) वही ब्रह्म सबके हृदगुहा में भी सर्वात्मा रूप से निहित हैं‌। (यत् साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः ~ बृहदारण्यकोपनिषद् ३.४.१)

ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्। तद्देवानसृजत तद्देवान्त्सृष्ट्वैषु लोकेषु व्यारोहयदस्मिन्नेव लोकेऽग्निं वायुमन्तरिक्षे दिव्येव सूर्यम् ॥ (शतपथब्राह्मणम् ११.२.३)

“(इदमग्र) प्रारंभ में जो कुछ था, वह (ब्रह्म) ब्रह्म [श्रीराम] (वा) ही (आसीत्) थे। (तद्देवानसृजत) तब उन्होंने [विभिन्न नाम-रूप वाले] देवों की सृष्टि की, (तद्देवान्त्सृष्ट्वैषु) देवों की सृष्टि कर उन्हें (लोकेषु व्यारोह) विभिन्न उर्ध्व लोकों में स्थापित किया, (अस्मिन्नेव लोकेऽग्निं) इस लोक में अग्नि, (वायुमन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में वायु, तथा (दिव्येव सूर्यम्) दिव लोक में सूर्य को (स्थापित किया)॥”

श्रीवाल्मीकि-रामायण में ब्रह्मा जी कहते हैं - हे श्रीराम! आप हीं तीनों कालों में दिखने वाले अक्षर अविनाशी ब्रह्म हैं, तथा हे श्रीराम आप ही इन्द्रकर्मा (~ श्रीवाल्मीकि रामायण ६.११७.१७) हैं अर्थात् इन्द्रादि सभी देवताओं की भी सृष्टि करने वाले आप ही हैं!

अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ (छान्दोग्योपनिषद् ३. १३. ७)
सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत। (छान्दोग्योपनिषद् ३.१४.१)

“(अथ) अब आगे (विश्वतः पृष्ठेषु) समस्त विश्व से परे, (सर्वतः पृष्ठेषु) समष्टितत्त्व सभी देवों से भी परे, यहाँ तक कि (परो दिवो) त्रिपाद्विभूति के (अनुत्तमेषूत्तमेषु) उत्तम से उत्तम दिव्य लोकों से भी परे [अपराजिता पुरी परमधाम साकेत में] (यत्) जो ब्रह्म (ज्योति) ज्योति (दीप्यते) दीप्यमान हो रही है, (यत् इदं वाव) जो यह परम ज्योति है वही (अस्मिन् पुरुषे) इस शरीर के (अन्तः) अन्दर में (ज्योति) ज्योति है! (३. १३. ७)
(खलु) निश्चय ही (इदं) यह (ब्रह्म) ब्रह्म [श्रीराम] (सर्वं) सर्व शरीरक अर्थात् सर्वात्मक हैं [जगत्सर्वं शरीरं ते ~ वाल्मीकीये], (तज्जलानिति = तत्+ज+ल+अन्+इति) यह सम्पूर्ण संसार उस ब्रह्म [श्रीराम] से ही (ज) उत्पन्न होता है और उन्हीं में (ल) लीन हो जाता है, तथा उन्हीं में (अन्) प्राण धारण करता है, (इति) ऐसे जगज्जन्मलयादिकारण रूप ब्रह्म [श्रीराम] हैं। ऐसा समझकर (शान्त) शान्तचित भक्त, उन ब्रह्म [श्रीराम] की (उपासीत) उपासना करे!(छान्दोग्योपनिषद् ३.१४.१)”

छान्दोग्योपनिषद् में ब्रह्म की नगरी को अपराजिता पुरी कहा गया है, अथर्ववेद में श्रीअयोध्या महापुरी का ही अन्य नाम अपराजिता पुरी कहा गया है, अयोध्या नाम का अर्थ अपराजिता है! इसप्रकार, ब्रह्म और राम - ये दोनों शब्द एक ही परतत्त्व को कहते हैं।

यथा घटश्च कलश एकार्थस्याभिधयाकः ।
तथा ब्रह्म च रामश्च नूनमेकार्थतत्परः ॥
(अगस्त्य-संहिता १९.२९)

“जैसे ‘घट’ शब्द और ‘कलश’ शब्द दोनों एक ही पदार्थ का अभिधान करते हैं, उसी प्रकार ‘ब्रह्म’ शब्द और ‘राम’ शब्द का एक ही अर्थ (परमतत्त्व ‘राम’) होता है।”


सीताराम युगल ब्रह्म हैं

इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तं वा एतमिन्ध सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः॥ (बृहदारण्यकोपनिषत् ४.२.२)

“(योऽयं) यह जो (दक्षिणे) दाहिनें (अक्षन्) नेत्र में (पुरुषः) पुरुष है, (एषः) यह (इन्धो) इन्ध [देदीप्यमान] (नाम) नाम वाला (ह) प्रसिद्ध है, (तम्) उसे (वै) ही (एतम्) इस पुरुष को (इन्ध) इन्ध [देदीप्यमान] (सन्तं) होते हुए भी (इन्द्र) इन्द्र (इति) इस (परोक्षेणैव) परोक्ष नाम से ही (आचक्षते) ऋषि-ज्ञानी कहते हैं, (हि) क्योंकि (देवाः) देवता परोक्ष से विशेष प्रेम करने वाले के (इव) समान होते हैं!”

‘ञिइन्धी दीप्तौ’ इस धातु से दीप्ति गुण वाले के अर्थ में ‘इन्ध’ शब्द की निष्पत्ति होती है, और ‘राजृ दीप्तौ’ धातु से अतिशय देदीप्यमान के अर्थ में ‘राम’ शब्द है! ‘इरां ददाति’ दानार्थक ‘डुदाञ्’ धातु से ‘इन्द्र’ शब्द बनता है, ‘राति ददाति’ दानार्थक ‘रा’ धातु से भक्तों को उनके सभी मनोवाञ्छित वर भुक्ति-मुक्ति-भक्ति देने वाले परमेश्वर के अर्थ में ‘राम’ शब्द है! ‘इदी परमैश्वर्ये’ से परम-ऐश्वर्यवान् के अर्थ में ‘इन्द्र’ शब्द बनता है, और श्रीराम सम्पूर्ण लोकों के राजा हैं, इस प्रकार ‘इन्द्र’ और ‘राम’ शब्द दोनों पर्यायवाची हैं, इन्द्र शब्द के परम वाच्य सीतापति श्रीराम हीं हैं, अतः भगवान् श्रीराम को रामायण में ‘कोसलेन्द्र’ (~वाल्मीकीये) - कोसल के इन्द्र कहा गया है, जिनका नाम ‘इन्द्र’ - देवताओं में इन्द्र नाम के देवता ग्रहण करते हैं।

अथैतद्वामेऽक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयोरेष सस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं ॥ (बृहदारण्यकोपनिषत् ४.२.२)

“(अथ) दक्षिण नेत्र में परब्रह्म श्रीराम को कहने के उपरान्त अब (एतद्) यह जो (वामे) बायें (अक्षणि) नेत्र में (पुरुषरूप) पुरुषाकार रूप वाली (एषा) यह नारी (अस्य) इस इन्द्र शब्द वाच्य परम देदीप्यमान् परब्रह्म श्रीराम की (विराट्) विशेष रूप से देदीप्यमान् [विशेषेण राजत् इति वि+राट्] (पत्नी) पत्नी सीताजी हैं, (तयोः) उन दोनों देदीप्यमान पति-पत्नी सीताराम जी की (एष) यह (सस्तावो) एकान्त संभोग भूमि (य) जो (एषो) यह (अन्तर्हृदय) अन्तः हृदयकमल के मध्य में (आकाशो) आकाश है (एतत्) यह (एनयोः) उन दोनों सीता-राम का (अन्नं) भोग्य स्थानीय है!”

‘राजृ दीप्तौ’ धातु से विशेष रूप से देदीप्यमान ‘विशेषेण राजत् इति विराट् [विराज]’ के अर्थ में ‘विराट्’ शब्द की निष्पत्ति है, उसी प्रकार ‘राजृ दीप्तौ’ से देदीप्यमान के अर्थ में ‘राम’ शब्द है! इन दोनों परम-देदीप्यमान युगल-ब्रह्म ‘सीताराम’ जी की क्रीड़ा-रास भूमि हृदयाकाश है!

इन्द्रः॒ सीतां॒ नि गृ॑ह्णातु॒ तां पू॒षानु॑ यच्छतु ।
सा नः॒ पय॑स्वती दुहा॒मुत्त॑रामुत्तरां॒ समा॑म् ॥
(ऋग्वेद ४.५७.७, अथर्ववेद ३.१७.४)

“(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् श्रीराम (सीतां) श्री सीताको (नि गृह्णातु) ग्रहण करें, और (तां) उन सीता जी को (पूषा) पुत्री रूप में पालन-पोषण करने वाले राजा जनक श्रीरामको (अनुयच्छतु) प्रदान करें। (सा) वह सीता जी (नः) हम लोगों को (उत्त॑रामुत्तरां॒ समा॑म्) आनेवाले वर्षों में [अत्यन्तसंयोगे द्वितीया] (दुहाम् - दोग्ध्रीणां मध्ये) कामधेनुवत सुख प्रदान करने वालों में सर्वाधिक सुखरूप (पयस्वती) धन-धान्य प्रदान करने वाली हों।”

श्रीसीता का संबंध एकमात्र श्रीराम से है, अतः यहाँ इन्द्र शब्द से वाच्य परब्रह्म परमात्मा श्रीराम ही हैं।


सभी नाम एक परब्रह्म श्रीराम के ही हैं

इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमा॑हु॒रथो॑ दि॒व्यः स सु॑प॒र्णो ग॒रुत्मा॑न् ।
एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः ॥
(ऋग्वेद १.१६४.४६)

“(एकं सद्) एक ही सत् तत्त्व [परब्रह्म श्रीराम] हैं, (विप्रा बहुधा वदन्ति) जिनका वर्णन ज्ञानीजन [ऋषि] बहुत प्रकार के नामों से [परोक्ष रूप से] करते हैं। (इन्द्रं मित्रं वरुणं अग्निम् आहुः) उन्हीं को [ऐश्वर्यवान् होने से] इन्द्र, [मित्रवत् होने से] मित्र, [श्रेष्ठ होने से] वरुण, [प्रकाशक होने से] अग्नि (आहु) कहते हैं, (अथ) और वह [द्युतिमान् होने से] दिव्य, [सुन्दर होने से] सुपर्ण, और [महान होने से] गरुत्मान् हैं।”

एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।
इन्द्रमेकेऽपरे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥
(मनुस्मृति १२.१२३)

“इस परमात्मा को कोई अग्नि, कोई मनु, कोई प्रजापति, कोई इन्द्र, कोई प्राण, और कोई सनातन ब्रह्म कहता है।”

लौकिकावैदिकाः शब्दाः येकेचित्सन्तिपार्वति ॥
नामानि रामचन्द्रस्य सहस्त्रंतेषुचाधिकम् ।
(श्रीपद्म-महापुराण ६.२८१.२६)

शिव जी कहते हैं —
“हे देवि पार्वती! जो भी लौकिक और वैदिक शब्द (नाम) हैं, वे सभी भगवान् श्रीराम के ही नाम हैं।”

अर्थात् ॐ, तत्, सत्, ब्रह्म, पुरुष, पुरुषोत्तम, नारायण, विष्णु, हरि, वासुदेव, कृष्ण, विराट्, शिव, सदाशिव, महादेव, रूद्र, इन्द्र, अग्नि, आत्मा, प्राण, इत्यादि - ये सभी नाम सनातन-ब्रह्म अर्थात् मूल-परब्रह्म श्रीराम के ही हैं, अपने परम अर्थ में वे नाम परब्रह्म भगवान् श्रीराम को ही कहते हैं। उन एको अद्वितीय ब्रह्म श्रीराम के ही ये विभिन्न नाम उनके अवतार और अन्य देव ग्रहण करते हैं, परन्तु राम-नाम और राम-रूप वाले स्वयं सनातन-ब्रह्म, मूल-परब्रह्म हैं।


परात्पर-तत्त्व मूल-परब्रह्म

वह सनातन-ब्रह्म अथवा स्वयं मूल-परब्रह्म कौन हैं?

अथातो ब्रह्म जिज्ञासा

श्रीवाल्मीकि रामायण के प्रारंभ (अथातो) में परतत्त्व (ब्रह्म) निश्चयार्थ महर्षि वाल्मीकि सर्वगुणसमष्टि रूप षोडश-कला वाले ‘नर’ के बारे में सर्वज्ञ देवर्षि नारद जी से अतिकौतूहलता पूर्वक जिज्ञासा करते हैं। महर्षि वाल्मीकि द्वारा पूछे गए एक-एक गुण संसार में अतिदुर्लभ हैं, तब वैसे अतिदुर्लभ १६ गुणों से युक्त सर्वगुणसमष्टि रूप षोडश-कला युक्त परमात्मा के अतिरिक्त और कौन हो सकता है? अतः यह निश्चित हुआ कि गुणों के आधार पर ही महर्षि वाल्मीकि द्वारा परतत्त्व की जिज्ञासा (अथातो ब्रह्म जिज्ञासा) की गयी है! देवर्षि नारद महर्षि वाल्मीकि से कहते हैं, हे महर्षि! आपने जिन गुणों के संबन्ध में प्रश्न किया है, वे गुण अत्यन्त ही दुर्लभ हैं, अर्थात् उनमें से एक-दो गुण भी किसी में प्राप्त होना संसार में दुर्लभ ही है, तब आपके द्वारा वर्णित वे १६ गुण एक साथ किसी एक ही पुरुष में होना नितान्त हीं दुर्लभ है, तथापि मैं इस विषय में भलीभांति विचारकर उन सम्पूर्ण १६ गुणों से संपन्न ‘नर’ के बारे में कहता हूँ, आप सुनिए।

तदोपरान्त, देवर्षि नारद सर्वगुणसमष्टि रूप षोडश-कला वाले ‘नर’ भगवान् श्रीराम के बारे में कहते हैं। देवर्षि नारद जी ने श्रीराम को विष्णु अथवा विष्णु का अवतार न कहकर, जैसे परतत्त्व परब्रह्म का गुणों के द्वारा सीधे प्रतिपादन हो सकता है, उसी अनुरूप ही परतत्त्व श्रीराम का प्रतिपादन किया है। (विशेष के लिए यहाँ पर मूल-रामायण पढ़े!) यद्यपि महर्षि वाल्मीकि पहले से ही श्रीराम के बारे में प्रत्यक्ष जानते हैं, क्योंकि इनके आश्रम जाकर स्वयं भगवान् श्रीराम ने इन्हें प्रणाम किया है (इति सीता च रामश्च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः । अभिगम्याश्रमं सर्वे वाल्मीकिमभिवादयन्॥ ~ श्रीवाल्मीकि रामायण २.५६.१६), और उस समय सम्पूर्ण संसार राममय हो रहा था (रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः। रामभूतं जगाभूद्रामे राज्यं प्रशासति ॥ ~ श्रीवाल्मीकि रामायण ६.१२८.१०३), अतः महर्षि वाल्मीकि का प्रश्न सामान्य नहीं है, वे तो स्वयं देवर्षि नारद जी के मुख से सबके कल्याणार्थ यह निश्चय करवाना चाहते हैं कि वेदवेदान्तवेद्य परतत्त्व श्रीराम हीं हैं अथवा कोई अन्य? जैसे छः गुणों से परिपूर्ण तत्त्व को भगवद् तत्त्व कहा जाता है, उसी प्रकार सोलह-कला वाले परतत्त्व के निश्चयार्थ महर्षि वाल्मीकि द्वारा जिज्ञासा की गयी, और उसके अनुरूप ही देवर्षि के असाधारण उत्तर में परतत्त्व श्रीराम का ही प्रतिपादन है।

महर्षि वाल्मीकि ने ऐसे ‘नर’ की जिज्ञासा की जो सर्वगुणसमष्टि रूप हो, (महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् ॥ ~ श्रीवाल्मीकि रामायण १.१.६), अर्थात् जो अपने गुणों में एको अद्वितीय साक्षात् स्वयं परतत्त्व ही हो। वस्तुतः ‘नर’ शब्द से सनातन परमात्मा ही कहे जाते हैं, महाभारत में कहा गया है — ‘नरतीति नरः प्रोक्तः परमात्मा सनातनः ॥’ — अर्थात् सद्गति प्रदान करने के कारण सनातन परमात्मा को ‘नर’ कहा जाता है।

जब भगवान् श्रीराम का प्राकट्य होता है तब महर्षि वाल्मीकि कहते हैं —

प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
कौसल्याऽजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम् ॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण १.१८.१०)

“देवी कौसल्या ने समस्त लोकों के स्वामि, समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत, दिव्यलक्षणों से युक्त (अर्थात् दिव्यवपु वाले) श्रीराम को जन्म दिया।”

यहाँ पर महर्षि वाल्मीकि यह कह सकते थे कि देवी कौसल्या ने एक अद्भूत बालक अथवा दिव्यलक्षणों वाले एक बालक (तमद्भ‍ुतं बालकम् ~ श्रीमद् भागवत महापुराण / बालकं दिव्यलक्षणसंयुतम्) को जन्म दिया, क्योंकि अभीतक देवी कौसल्या के पुत्र का नामाकरण संस्कार भी नहीं हुआ था, तब भी महर्षि वाल्मीकि कहते हैं देवी कौसल्या ने ‘श्रीराम’ को जन्म दिया, अर्थात् समस्त लोकों के स्वामि भगवान् श्रीराम अपने प्राकट्य के पूर्व भी अपने ‘राम’ नाम से प्रसिद्ध थे।

जन्म से ग्यारह दिनों के पश्चात् नामकरण संस्कार के समय महर्षि वशिष्ठ प्रभु का नाम ‘श्रीराम’ रखते हुए कहते हैं —

श्रियः कमलवासिन्या रमणोऽयं महान्प्रभुः ।
तस्माच्छ्रीराम इत्यस्य नाम सिद्धं पुरातनम् ॥
(श्री पद्म-महापुराण ६.२४२.७६)

“ये महाप्रभु (साकेत के) कमलवन में निवास करनेवाली श्रीदेवी सीताजी के साथ रमण करनेवाले हैं, इसलिये इनका पुरातन स्वतःसिद्ध नाम ‘श्रीराम’ होगा॥”

दूसरों को रमाने (आनन्द प्रदान करने) और स्वयं सबमें रमने (अन्तर्यामी रूप से निवास करने) के कारण परमप्रभु ‘राम’ कहाते हैं, और सीताजी के साथ नित्य संयोग है और श्रीदेवी ‘सीताजी’ को रमाते हैं, अतः महर्षि वशिष्ठ ने ‘श्री’ के साथ ‘श्रीराम’ कहा!

श्रीमद्वाल्मीकि रामायण में श्रीब्रह्मा जी कहते हैं हे भगवान् श्रीराम आप ही श्रीनारायण हैं, आप ही श्रीवराह हैं, आप ही श्रीविष्णु हैं, आप ही श्रीकृष्ण हैं, आप ही स्वयं-प्रभु अर्थात् स्वयं-परब्रह्म हैं!

अक्षरं ब्रह्म सत्ये च मध्ये चान्ते च राघव ।
(श्रीवाल्मीकि रामायण ६.११७.१४)

“हे श्रीराम! आप ही आदि, मध्य और अंत में दिखने वाले अक्षर (सत्य-सनातन अविनाशी) ब्रह्म हैं।”

अर्थात् द्विभुज राजीवलोचन राघव श्रीराम रूप प्रभु का नित्य अविनाशी रूप है, और श्रीमन्नारायण, श्रीविष्णु, श्रीकृष्ण, श्रीवराह आदि प्रभु के अवतार हैं!

राम-नाम परब्रह्म

राम नाम परं ब्रह्म सर्वदेवाधिकं महत् ।
(श्रीपद्म-महापुराण ७.१५.२८)

“‘राम’ नाम परब्रह्म हैं, यह नाम समस्त देवों से भी अधिक महान है।”

प्रभु के समस्त नामों में राम नाम परब्रह्म कहा गया है, राम शब्द से साक्षात् मूल-परब्रह्म कहे जाते हैं।

यथा घटश्च कलश एकार्थस्याभिधयाकः ।
तथा ब्रह्म च रामश्च नूनमेकार्थतत्परः ॥
(अगस्त्य-संहिता १९.२९)

“जैसे ‘घट’ शब्द और ‘कलश’ शब्द दोनों एक ही पदार्थ का अभिधान करते हैं, उसी प्रकार ‘ब्रह्म’ शब्द और ‘राम’ शब्द का एक ही अर्थ (परमतत्त्व परब्रह्म ‘राम’) होता है।”

श्रीराम-रूप परब्रह्म का मूलरूप

योऽसावयोध्याधिपतिः स परब्रह्मशब्दितः ।
तस्य या जानकी देवी साक्षात्सा चिन्मयी स्मृता ॥
(श्रीपद्म-महापुराण ५.२८.६३)

“जो अयोध्यापति ‘श्रीराम’ हैं वे ही ‘परब्रह्म’ शब्द से कहे जाते हैं, जो उनकी धर्मपत्नी जनककिशोरी सीता देवी हैं वे परब्रह्म भगवान् श्रीराम की साक्षात् चिन्मयी शक्ति कही गयी हैं।”

अतएव, जो वास्तविक मूल-परब्रह्म हैं वो श्रीराम हैं, और जो श्रीराम हैं वही मूल-परब्रह्म हैं। श्रीरामावतार में परब्रह्म के नाम और रूप में कोई अंतर नहीं होता, परन्तु चतुर्भुज विष्णु, नारायण आदि में स्वयं-परब्रह्म का रूपान्तर और नामांतर हो जाता है, अतः काकभुशुण्डि जी ने अनन्त ब्रह्माण्डों में अनन्त प्रकार के भिन्न-भिन्न विष्णु देखें, परन्तु श्रीराम रूप दूसरा नहीं देखा, अर्थात् श्रीराम ही वास्तविक मूल-परब्रह्म हैं।

मरीचिमण्डले संस्थं बाणाद्यायुधलाञ्छितम् ।
द्विहस्तमेकवक्त्रं च रूपमाद्यमिदं हरेः ॥
(पद्म-संहिता)

“सूर्यमण्डल (दिव्य-प्रकाश) के बीच में, दो हाथों और एक मुख वाले, धनुष और बाण से संयुक्त ही - श्रीहरि (भगवान्) का मूल-रूप है।”

दो भुजाओं में भगवान् श्रीमन्नारायण या भगवान् वासुदेव के चक्र-आदि चार-आयुध संभव नहीं हैं, मात्र धनुष और बाण ही संभव हैं। इन सबके अतिरिक्त सभी वेद (मंत्र-संहिता ऋग्वेद, यजुर्वेद, आदि) एक स्वर में कहते हैं कि परब्रह्म *अपनी दो भुजाओं* में धनुष और बाण धारण करते हैं।

नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे नम:।
नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यां उत ते नमः ॥
(कृष्ण-यजुर्वेद ४.५.१)

“(रूद्र) हे द्विभुज रूद्र प्रभु श्रीराम! आपके (मन्यव) क्रोध-शक्ति को (नमस्ते) नमस्कार है (उत) तथा आपके [मुक्ति-प्रदाता] (इषवे) बाण को भी (नम:) नमस्कार है! (उत) और, हे प्रभु! (ते) आपके (धन्वने) धनुष को भी (नमस्ते अस्तु) नमस्कार है तथा (बाहुभ्यां) आपकी दोनों भुजाओं को भी नमस्कार है।”

परम ब्रह्म श्रीराम कार्य-कारण भेद से सर्वात्मकम् सर्वात्मा हैं, वही रूद्र रूप में भी हैं, रूद्र, शिव, आदि उनके ही नाम हैं। श्रीवाल्मीकि रामायण में भी महर्षि वाल्मीकि श्रीराम, सीता और लक्ष्मणजी की शोभा की तुलना शिव, पार्वती और नन्दी से करते हैं। अतः रूद्र परक श्रुति वचनों से भी उन्हीं परम-पुरुषोत्तम श्रीराम की स्तुति है! भगवान् रूद्र शिव की दो भुजाएं नहीं होती, वे चतुर्भुज बहुभुज हैं, अतः यहाँ द्विभुज रूद्र से परम-पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीराम को कहा गया है, वे ‘रुतिं शब्दं वेदात्मानं ब्रह्मणे कल्पादाविति रूद्र’ भगवान् कल्प के प्रारंभ में रुति अर्थात् शब्दब्रह्म रूपी वेदों को ब्रह्मा को देते हैं इसलिए वे रूद्र नाम से कहे जाते हैं, ‘रुदं संसारदुःखं द्रावयतीति रुद्रः’ भगवान् संसार के दुःखों को दूर करते हैं इसलिए रूद्र नाम से कहे जाते हैं, इत्यादि।

इस प्रकार इन्द्र, रूद्र, और विष्णु परक समस्त श्रुति वचनों का समन्वय परब्रह्म श्रीराम की महिमा में अनायास हो जाता है (तत्तु समन्वयात् ॥ ~ ब्रह्मसूत्र १.४ — उस परब्रह्म [श्रीराम] को शास्त्र वचनों के समन्वय से जाना जाता है)।

भगवान् के परात्पर स्वरूप को द्विभुज ही कहा गया है —

स्थूलं चाष्टभुजं प्रोक्तं सूक्ष्मं प्रोक्तं चतुर्भुजम् ।
द्विभुजं परात्परं प्रोक्तं तस्मादेतत्त्रयं यजेत् ॥
(आनन्द-संहिता)

“भगवान् का स्थूल स्वरूप अष्टभुज (श्वेतद्वीप के भूमा-विष्णु) कहे गए हैं, और उनका सूक्ष्म-रूप चतुर्भुज-विष्णु कहे गए हैं, और उनका द्विभुज-स्वरूप परात्पर रूप कहा गया है, इसलिए इन तीनों रूपों की पूजा करनी चाहिए।”

द्विभुज श्रीराम हीं मूल सनातन-विष्णु हैं

इन्हीं सनातन-ब्रह्म का नाम सनातन-विष्णु है —

स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः।
अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुस्सनातनः॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण २.१.७)

शब्दार्थ और अन्वय

सः — वह (श्री राम); हि — वस्तुतः स्वयं, साक्षात्; विष्णुस्सनातनः — अनादि सनातन-विष्णु हीं थे जो कि; उदीर्णस्य रावणस्य — उद्भट रावण के; वधार्थिभिः — वध की इच्छ रखने वाले; देवैः — देवताओं द्वारा; अर्थितः — प्रार्थित होने पर, मानुषे लोके — मनुष्य लोक में; जज्ञे — अवतीर्ण (प्रकट) हुए थे।

भावार्थ —

“वह श्रीराम वस्तुतः (स्वयं, साक्षात्) सनातन-विष्णु [अर्थात विष्णु के भी विष्णु साकेताधीश सनातन विष्णु] हीं थे जो कि उद्भट (प्रचण्ड) रावण के वध की इच्छ रखने वाले देवताओं द्वारा प्रार्थित होने पर मनुष्य लोक में अवतीर्ण (प्रकट) हुए थे।”

महर्षि वाल्मीकि श्रीअयोध्याकाण्ड के प्रारम्भ में हीं बता देते हैं श्रीराम कौन हैं?

(स) 'तेषामपि महातेजा रामो' श्रीराम वास्तव में/स्वयं में (हि) सनातन-विष्णु [सभी विष्णु स्वरूपों के भी विष्णु साकेताधीश सनातन-विष्णु] हीं हैं, सनातन-विष्णु श्रीराम से हीं अन्य सारे विष्णु-स्वरूपों और अवतारों का प्राकट्य होता है (संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥), परन्तु इनका प्राकट्य अन्य किसी से नहीं होता, अन्य से प्राकट्य नहीं है स्वयं प्रकट हैं अतः सनातन-विष्णु (स्वयं शाश्वत मूल-परब्रह्म) हैं, वह श्रीराम ही सभी के प्रभु, प्रभुओं के भी प्रभु (प्रभोः प्रभुः) और सर्वलोकों के इष्ट हैं!

देवाधिदेव महादेव श्रीराम की स्तुति करते हुए कहते हैं —

महादेव उवाच - नमो मूलप्रकृतये नित्यायपरमात्मने ।
सच्चिदानन्दरूपाय विश्वरूपाय वेधसे ॥
नमोनिरन्तरानन्दकन्द मूलायविष्णवे ।
(श्री पद्म-महापुराण ६.२७०.२४-२५)

“हे श्रीराम! आपको नमस्कार है, आप समस्त जगत के मूल-स्रोत, सनातन परमात्मा, सच्चिदानन्द स्वरूप, विश्वरूप, सर्वविधाता, नित्य निरन्तर आनन्द के स्रोत, तथा मूल-विष्णु हैं।”

वेदों के विष्णु भी द्विभुज श्रीराम हैं

बहुत से लोग विष्णु शब्द देखकर चतुर्भुज-विष्णु का अर्थ ग्रहण कर लेते हैं, परन्तु वेदों में परमव्योम (दिवं) के विष्णु भी वस्तुतः द्विभुज ही हैं, यथा —

दि॒वो वा॑ विष्णऽउ॒त वा॑ पृथि॒व्या म॒हो वा॑ विष्णऽउ॒रोर॒न्तरि॑क्षात्। उ॒भा हि हस्ता॒ वसु॑ना पृ॒णस्वा प्रय॑च्छ॒ दक्षि॑णा॒दोत स॒व्याद्विष्ण॑वे त्वा ॥ (यजुर्वेद ५.१९)

“हे (विष्णो) द्विभुज-विष्णु [श्रीराम] ! आप कृपा करके हम लोगों को (दि॒वो) दिव्य लोक परमधाम से (वा) अथवा (पृथि॒व्या) भू लोक से (वा॑) अथवा (म॒हो) महत् (उरोः) विस्तीर्ण (अन्तरि॑क्षात्) अन्तरिक्ष से (उ॒भा हि हस्ता॒) अपने दोनों [उभा] हाथों को (वसु॑ना) धन-ऐश्वर्य से (आपृणस्व) भरकर, आप अपने (दक्षिणात्) दक्षिण (उत) और (सव्यात्) वाम हाथों द्वारा हमें (प्रय॑च्छ॒) उन सुख-धन-ऐश्वर्य को प्रदान कीजिये! हे काष्ठस्तम्भ, मैं (त्वा) तुम्हें (विष्णवे) विष्णु की प्रीति (यज्ञ-पूजन) के निमित्त भूमि में गाड़ता हूँ॥”

यहाँ वेद स्पष्टतः विष्णु की दो भुजाएँ कहते हैं, ये द्विभुज विष्णु अन्य कोई नहीं सनातन-विष्णु श्रीराम हैं।

इस वेदमन्त्र (यजुर्वेद ५.१९) द्वारा शतपथ-ब्राह्मण में याज्ञिक प्रक्रिया (विष्णु पूजन) करने का उपदेश है — अथ प्रतिप्रस्थाता । उत्तरं हविर्धानमुपस्तभ्नाति दिवो वा विष्ण उत वा पृथिव्या महो वा विष्ण उरोरन्तरिक्षात उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत सव्याद्विष्णवे त्वेति मेथीमुपनिहन्तीतरतस्ततो यदु च मानुषे तद्यद्वैष्णवैर्यजुर्भिरुपचरन्ति वैष्णवं हि हविर्धानम् ॥ (शतपथब्राह्मणम् ३.५.३.२२)

पुनः पुरुष सूक्त में भी 'बाहू रा॑ज॒न्यः॑ कृ॒तः' से (बाहु में द्वितीय विभक्ति होने से) परम-पुरुष को द्विभुज ही कहा गया है —

ब्रा॒ह्म॒णो॑ऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा॑ज॒न्यः॑ कृ॒तः । ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्यः॑ प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत ॥ (ऋग्वेद १०.०९०.१२, यजुर्वेद ३१.११)

वेदों में परब्रह्म की नगरी त्रिपादस्यामृतं परमधाम अयोध्या महापुरी के ब्रह्म भी वस्तुतः द्विभुज यक्ष (परम-पूज्य) श्रीराम ही हैं।

वेदों और वाल्मीकि रामायण के अनुसार ही सुन्दरी तन्त्र इत्यादि में सनातन परमात्मा को द्विभुज श्रीराम कहा गया —

ययौ तथा महाशम्भू रामलोकमगोचरम् ।
तत्र गत्वा महाशम्भू राघवं नित्यविग्रहम्॥
ददर्श परमात्मानं समासीनं मया सह ।
सर्वशक्तिकलानाथं द्विभुजं रघुनन्दनम् ॥
द्विभुजाद्राघवान्नित्यात्सर्वमेतत्प्रवर्तते ।
(सुन्दरीतन्त्र)

सीताजी कहती हैं — “महाशम्भु जब मन-वाणी से परे इन्द्रियातीत श्रीरामलोक साकेत को गए, तब उन्होंने वहां मेरे साथ बैठे परमात्मा श्रीराम के नित्य-सनातन विग्रह का दर्शन प्राप्त किया। सर्व-शक्तियों एवं सर्व-कलाओं के नाथ द्विभुज रघुनन्दन हैं, उन्हीं द्विभुज नित्य-सनातन परमात्मा राघव से ही समस्त जगत उत्पन्न है!”


कार्य-ब्रह्म और कारण-ब्रह्म से परे श्रीराम

वस्तुतः परब्रह्म श्रीराम एक ही हैं, उन्होंने कार्य-ब्रह्म और कारण-ब्रह्म के भेद से अनेकों नाम-रूप धारण किये हुए हैं, परन्तु उन कार्य-कारण रूपों से भी पर रूप स्वयं परब्रह्म एकमात्र श्रीराम ही हैं —

एष रामः परंब्रह्म कार्यकारणतः परम्।
चराचरजगत्स्वामी न मानुषवपुर्धरः॥
एतद्धिब्रह्मविज्ञानमधुनाज्ञातवानहम्।
(श्रीपद्म महापुराण ५.२८.५९-६०)

“ये श्रीराम कार्य-ब्रह्म (नाना भिन्न-भिन्न विष्णु) और कारण-ब्रह्म (कारणजलशायी नारायण, आदि विभिन्न भगवद् स्वरूपों) से परे साक्षात् परब्रह्म हैं, ये ही चराचर जगत् के स्वामी हैं, मानव शरीर धारण करने पर भी वे वास्तव में मनुष्य-शरीर वाले नहीं (वरन् दिव्य-वपु वाले दिव्यलक्षणसंयुतम्) हैं। इन्हें जानना ही वास्तविक ब्रह्मज्ञान है। (ऋषि कहते हैं) इस तत्त्वज्ञान को मैं अभी जान पाया हूँ।”

वास्तविक ब्रह्मज्ञान यही है कि कार्य-कारण से परे परब्रह्म श्रीराम हैं, श्रीविष्णु-श्रीनारायण-श्रीकृष्ण आदि सभी स्वरूप इन्हीं के अवतार हैं।

अतः ब्रह्म के तीन प्रकार हैं —
(१) कार्य ब्रह्म — व्यूह-विष्णु, प्रतिब्रह्माण्ड भिन्न-भिन्न विष्णु
(२) कारण ब्रह्म — कारणजलशायी नारायण, श्रीकृष्ण
(३) कार्य-कारण से परे परब्रह्म — श्रीराम

कार्यब्रह्म और कारणब्रह्म इन दोनों से परे होने से वास्तविक रूप से श्रीराम ही मूल-परब्रह्म हैं, बाकि भगवद् स्वरूप उनके अवतार होने से (उनसे तात्त्विक अभेद होने से) परब्रह्म कहे जाते हैं!

राम एव परं ब्रह्म...
नारायणं नारसिंहं वासुदेवं वाराहं... एतानि रामस्याङ्गानि जानीथाः।
(श्रीरामरहस्योपनिषत्)

विष्णुभक्त-योगी-ऋषि-मुनि, प्रह्लाद आदि द्वारा परमतत्त्व संबन्धी ब्रह्म-जिज्ञासा (अथातो ब्रह्म जिज्ञासा) करने पर सर्वरहस्यविद् परमभागवत हनुमान जी उनको उपदेश करते हुए कहते हैं —
“श्रीराम ही वस्तुतः परम ब्रह्म (परमतत्त्व) हैं! ..... नारायण, नरसिंह, वासुदेव, वराह ... इत्यादि ये सभी भगवान् श्री रामके अंग (अंश) हैं, ऐसा जानना चाहिए।”

अयोध्यापति श्रीराम ही वेदों के परमगुह्यतम रहस्य हैं, श्रीराम ही परब्रह्म हैं, वे श्रीनारायण-श्रीविष्णु आदि रूपों के पूर्व भी विद्यमान रहते हैं, वे श्रीविष्णु भगवान् के अवतार नहीं, अपितु स्वयं ही रामाख्य परब्रह्म हैं, जो अनन्त-विष्णु-नारायण आदि स्वरूपों के मूल-स्रोत हैं!


श्रीराम का श्रीविष्णु-अवतार

परमप्रभु श्रीराम परमप्रभु श्रीराम जब अपने परात्पर दुर्धर्ष साकेतबिहारी द्विभुज रूप से चतुर्भुजरूप धारण करते हैं तो उनके चतुर्भुज स्वरूप प्रभु के 'विष्णु' नाम को ग्रहण कर 'विष्णु' कहलाते हैं, यथा —

सर्वावतारी भगवान् रामश्चतुर्भुजोऽभवत् ।
(श्रीकोशलखण्ड)

“सर्वावतारी (सर्व भगवद् स्वरूपों के अवतारी) भगवान् श्रीराम ही (द्विभुज से) चतुर्भुज विष्णु रूप ग्रहण किये।”

ततस्त्वमसि दुर्धर्षात्तस्माद् भावात् सनातनात् ।
रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वं उपजग्मिवान् ॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण ७.१०४.९)

स्वयं काल भगवान् श्रीराम के प्रति उनसे ब्रह्मा जी के वचन कहते हैं —
“हे श्री राम! आपने अपने सनातन एवं दुर्धष (द्विभुज साकेतधीश) भाव को त्याग कर जगत के रक्षा के लिए विष्णु रूप धारण किया था।”

अर्थात् विष्णु रूप के भी अवतारी सनातन-विष्णु प्रभु श्रीराम हीं हैं! यही परम-प्रभु हैं!

नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥
(श्रीरामचरितमानस १.१४४.३)

“ जिन्हें वेद 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, यह भी नहीं) कहकर निरूपण करते हैं। जो आनंदस्वरूप, उपाधिरहित और अनुपम हैं एवं जिनके अंश से अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु भगवान प्रकट होते हैं।”

मनु-शतरूपा जी के तप को देखकर उनके समीप ब्रह्मा-विष्णु-शिव अनेकों बार गए (बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥), परन्तु उन्होंने अपने नेत्र नहीं खोलें, वे स्वयं-परमप्रभु का दर्शन करना चाहते थे, जिन्हें वेद अगुन-अखण्ड-अनन्त-अनादि कहते हैं (उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥ अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥), जिनका ध्यान परमारथवादी तथा स्वयं शिव जी करते हैं, जो भुशुण्डि के हृदय रूपी मानसरोवर के हंस हैं, अतः वे अपनी तपस्या में अडिग रहें, अन्ततः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं परमप्रभु श्रीसीताराम ने दर्शन दिए, जिनके अंश मात्र से अनेकों ब्रह्मा-विष्णु-शिव प्रगट होते हैं!

श्रीराम का श्रीमन्नारायण अवतार

संक्षिप्य हि पुरा लोकान मायया स्वयमेव हि ।
महार्णवे शयानोऽपसु मां त्वं पूर्वजीजनः ॥
(श्री वाल्मीकि रामायण ७.१०४.४)

स्वयं काल भगवान् श्रीराम के प्रति उनसे ब्रह्मा जी के वचन कहते हैं —
“हे श्रीराम! आपने ही अपनी इच्छा-मात्र (माया) से सम्पूर्ण लोकों का (अपने अन्दर) विलय कर महार्णव में (कारणार्णव में कारणजलशायी-नारायण के रूप में) सोए थे।”

अर्थात, श्रीनारायण रूप के पूर्व भी परब्रह्म ‘श्रीराम’ ही थें, जिन्होंने नारायण रूप से कारणार्णव के जल पर शयन किया था। समस्तलोक कारणजलशायी-नारायण के अन्दर संक्षिप्त बिन्दु (साम्य) रूप में रहते हैं, ‘नारा जलं अयनं स्थानं यस्य स नारायणः’ - नारा अर्थात जल जिसका निवास स्थान हैं वो प्रभु नारायण कहे गए हैं!

महोपनिषद् में कहा गया है सृष्टि के प्रारंभ में एक नारायण ही थे, तब उपरोक्त वचनों से समन्वय कैसे होगा?

एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नापो नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यो न चन्द्रमाः ॥
(महोपनिषद् १.२)

“सृष्टि के आदि में एक भगवान् नारायण ही थे। इनके अतिरिक्त न ब्रह्मा थे, न रुद्र (शिव) थे, न आपः (जल), न अग्नि न सोम आदि देवगण थे। न द्युलोक (आकाश) था, न पृथ्वी थी, और न ही नक्षत्र, चन्द्रमा एवं सूर्य आदि ही थे।”

यहाँ भगवान् नारायण का ब्रह्मा, और शिव, इत्यादि देवताओं से ही पूर्व होना कहा गया है, नर पद वाच्य नराकृति परब्रह्म परमात्मा श्रीराम से नहीं। वस्तुतः ‘नारायण’ शब्द से नारायण शब्द के वाच्य परब्रह्म श्रीराम का भी एक साथ ग्रहण है, क्योंकि समस्त नाम-रूप उन्हीं द्विभुज सनातन-विष्णु श्रीराम के हीं हैं, तथापि सृष्टि के प्रारंभ में चतुर्भुज नारायण भगवान् जो (ब्रह्मा, रूद्र आदि) अन्य समस्त देवों से पूर्व से विद्यमान हैं उनका प्राकट्य द्विभुज नराकृति परब्रह्म श्रीराम से ही है, इस वचन से अन्य वचनों का कोई विरोध नहीं है।

कारणजलशायी नारायण का प्राकट्य सर्वत्र नर रूपी सनातन-परमात्मा से कहा गया है —

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥
(मनु स्मृति १.१०)

“[सृष्टि के प्रारंभ में उत्पन्न] (आपो) जगत् उपादानकारण द्रव को (नारा) नारा (इति प्रोक्ता) कहते हैं, क्योंकि वह (आपो) जगत् उपादानकारण द्रव - जल (नर) ‘नर’ अर्थात् सनातन परमात्मा [श्रीराम]’ से (वै) ही (सूनवः) उत्पन्न हुआ था। (ता) वह नारा [जल] (पूर्वं) प्रथम (अयनं) निवास हुआ (यदस्य) जिनका, (तेन) इसलिए उनको (नारायणः) ‘नारायण’ (स्मृतः) कहा गया है।”

अतएव, श्रीराम ही वो ‘नर’ रूपी (एक मुख द्विभुज नराकृति) नराकृति परब्रह्म हैं जो चतुर्भुज श्रीमन्नारायण के पूर्व विद्यमान थे, ‘नर’ पद वाच्य पञ्चवक्त्र सदाशिव भी नहीं हो सकते हैं क्योंकि उनके पाँच-मुख और चार हाथ हैं। जिनके बारे में महर्षि वाल्मीकि देवर्षि नारद से अतिकौतुहलता से पूछते हैं (महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम्।), वे 'नराकृति परब्रह्म' परमात्मा श्रीराम हैं।

यहाँ शूलपाणी शिव की उत्पत्ति भगवान् नारायण से कही गयी है, परन्तु वे शूलपाणी भगवान् शिव के इष्टदेव भगवान् श्रीराम ही हैं, अतः पद्म-पुराण में शिव श्रीराम की प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! पार्वती और मैं शिव आपके ही राम नाम का जप करता हूँ, इससे भी वास्तविक मूल-परब्रह्म श्रीराम ही निश्चित होते हैं।

एक अखण्ड ब्रह्म श्रीराम के विभिन्न रूपों में तात्त्विक अभेदता होने से, उनके अवतार श्रीविष्णु, श्रीनारायण, श्रीकृष्ण आदि भी परमब्रह्म ही हैं! तथापि, श्रीराम के नाम, रूप, लीला, धाम सभी परात्पर होने से श्रीराम ही स्वयं मूल-परब्रह्म कहे जाते हैं (राम एव परं ब्रह्म), जो मूल-परब्रह्म हैं वो श्रीराम ही हैं और जो श्रीराम हैं वही मूल-परब्रह्म हैं, अवतारकाल में भी श्रीराम के नाम, रूप, धाम में अंतर नहीं होता!


शिवजी के इष्टदेव परब्रह्म भगवान् श्रीराम

भगवान् श्रीराम के राज्याभिषेक के समय द्विभुज रघुनाथ जी को अपनी बायीं ओर करकमल में लाल-कमल धारण किये बैठी हुई सर्वाभूषणविभूषिता कनकवर्णाङ्गी सीताजी को अपनी बायीं भुजा से आलिंगन किये देख पार्वतीजी के सहित भगवान् शंकर भक्ति-भाव से भरकर भगवान् श्रीराम की स्तुति करने लगे। वे देवाधिदेव महादेव पार्वतीजी सहित श्रीराम की स्तुति करते हुए कहते हैं —

चन्द्रसूर्यशिखिमध्यगतं यत् तेज ईश चिदशेषतनूनाम् ।
प्राभवत्तनुभृतामिव धैर्यं शौर्यमायुरखिलं तव सत्त्वम् ॥
(श्री अध्यात्म-रामायण ६.१५.५६)

“हे सर्वेश्वर श्रीराम! चन्द्र, सूर्य और अग्नि में जो तेज है, समस्त प्राणियों में जो चेतनांश है तथा देहधारियों में जो धैर्य, शौर्य, और जो आयुर्बल-सा दिखायी देता है, वह आपही की सत्ता है।”

समस्त जीव भगवान् श्रीराम के चिदांश हैं (ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥) ।

त्वं विरिञ्चिशिवविष्णुविभेदात् कालकर्मशशिसूर्यविभागात् ।
वादिनां पृथगिवेश विभासि ब्रह्म निश्चितमनन्यदिहैकम् ॥
(श्री अध्यात्म-रामायण ६.१५.५७)

“हे श्रीराम! भिन्न-भिन्न ईश्वर-वादियों को एक आप ही ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु के तथा काल, कर्म, चन्द्रमा, और सूर्य के भेद से पृथक-पृथक भासते हैं, किन्तु इसमें संदेह नहीं आप हैं एक अद्वितीय ब्रह्म हीं।”

मत्स्यादिरूपेण यथा त्वमेकः श्रुतौ पुराणेषु च लोकसिद्धः ।
तथैव सर्वं सदसद्विभागस्त्वमेव नान्यद्भवतो विभाति ॥
(श्री अध्यात्म-रामायण ६.१५.५८)

“जिस प्रकार वेद, पुराण और लोक में एक आप ही मत्स्यादि अनेक (अवतार) रूपों से प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार संसार में जो सत्-असत् रूप विभाग है वह आप ही हैं — आपसे भिन्न कुछ भी नहीं है।”

अहं भवन्नाम गृणन् कृतार्थो वसामि काश्यामनिशं भवान्या ।
मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेऽहं दिशामि मन्त्रं तव राम नाम ॥
(श्री अध्यात्म-रामायण ६.१५.५८)

“हे प्रभु श्रीराम! आपके नामोच्चारण से कृतार्थ होकर मैं अहर्निश पार्वती जी के सहित काशी में रहता हूँ और वहाँ मरणासन्न पुरुषों को उनके मोक्ष के लिए आपके तारक-मन्त्र ‘राम’ नाम का [उनके कानों में] उपदेश करता हूँ।”


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॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥