भगवान् श्रीराम का स्वयं परब्रह्मत्व

‘राम एव परब्रह्म’ (~श्रुति) — श्रीराम ही परब्रह्म हैं। परब्रह्म श्रीराम एक ही हैं, वही कार्य-कारण भेद से अनन्त (भिन्न-भिन्न अवतार श्रीविष्णु, श्रीनारायण, श्रीकृष्ण आदि) रूपों वाले हो जाते हैं, अर्थात् एक ही परब्रह्म अनेक रूपों वाले हैं, परन्तु उनमें और उनके स्वयं-अवतारों में तात्त्विक रूप से कोई अंतर नहीं होता, केवल नाम-रूप-लीला में ही भेद होता है।

जब बहुतों के लिए श्रुति परब्रह्मता कहती है तब श्रीराम ही मूल-रूप एवं सर्वावतारी किस प्रकार से हैं?

वेदों और उपनिषदों में जहाँ कोई नाम लेकर नहीं, बल्कि सामान्य वाचक शब्दों से ब्रह्म [परतत्त्व] का प्रतिपादन किया गया है, वहां श्रुति वस्तुतः श्रीराम का ही प्रतिपादन करती है।

यथा -

“ सूर्यान्तर्यामी सत्य-पुरुष (सनातन-ब्रह्म) एक मुख और दो भुजाएँ वाले हैं।” ~ बृहदारण्यकोपनिषद् ५.५.३

“ सूर्यान्तर्यामी सत्य-पुरुष (द्विभुज सनातन-ब्रह्म) का मुख दिव्य-ब्रह्मज्योतियों से ढंका हुआ है, हे सूर्यान्तर्यामी परमात्मा पूषन! मुझ सत्य-धर्मा को अपना दर्शन देने के लिए उसे हटा देवें। ” ~ ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र १५

“ सूर्यान्तर्यामी देदीप्यमान् (द्विभुज सनातन-ब्रह्म) पूषन (पोषणकर्ता-) परमात्मा [धनुष-] और बाण धारण करने वाले हैं, उन (साकेतस्थ) ‘साकेत’ परमात्मा को नमस्कार है।” ~ तैत्तिरीयारण्यकम् ४.१६

इस प्रकार ब्रह्म का मूल-रूप श्रीराम ही हैं! (मूल-रूप का विशेष प्रतिपादन ‘श्रीभगवान् का परात्पर स्वरूप’ शीर्षक के साथ किया गया है।) वही परब्रह्म अभिधावृत्ति से ‘राम’ कहाते हैं, अर्थात् परब्रह्म का मूल-नाम ‘राम’ है, उन्हीं परव्योमाधिपति परब्रह्म श्रीराम का ही सर्वावतारीत्व प्रतिपादन श्रुति में है।

श्रीनारायण, श्रीकृष्ण, श्रीरूद्र आदि का जहाँ परब्रह्मत्व श्रुति कहती है, उससे उनका जगतकारणत्व और अन्य-अवतार-कारणत्व का प्रतिपादन तो होता है, परन्तु परब्रह्म का सर्वावतारी-रूप और मूलरुपत्व का प्रतिपादन नहीं होता, जैसे श्रीराम का मूलरुपत्व और सर्वावतारीत्व का प्रतिपादन होता है।

परब्रह्म श्रीराम के अवतार-रूपों में उनके मूल-रूप से तात्त्विक अभेद है! ब्रह्म के अवतार होने से ही अन्य-रूपों को आदिदेव, परमदेव, एक-देव, आदि कहा गया है, परन्तु स्वयं-रूप से मूल-परब्रह्म अयोध्यापति श्रीराम हैं, श्रीराम ही सर्वावतारी हैं!

श्रीरूद्र -

एको हि रुद्रो न द्वितीयाय (~श्वेताश्वतरोपनिषद् ३.२)

“जगत के शासक एक ही देव रूद्र हैं, उनके समान कोई अन्य नहीं जो उन्हें दूसरा बना सके, वे सभी प्राणियों के हृदय में विद्यमान है। सभी जगतों का सृजन और पालन करने के बाद अन्त में वह अपने आप में इसे लीन कर लेते हैं।”

स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्।
स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः॥
(~कैवल्योपनिषद् ७-८)

“ वह आदि, मध्य. और अन्त से रहित जगतकारण परमेश्वर जो उमा (ब्रह्मविद्या) के साथ हैं, त्रिनेत्र (तीसरे दिव्यनेत्र वाले), नीलकण्ठ (केकिकण्ठाभनीलम्‌ - जो मयूर के कण्ठ के समान नील वर्ण हैं, अथवा जो नील कण्ठ वाले हैं) जो समस्त भूत-प्राणियों के मूल कारण हैं, वे ही ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, अक्षर, और परम-स्वराट् है, और वे ही विष्णु, प्राण, काल, अग्नि और चन्द्रमा हैं।”

यहाँ रूद्र (परमात्मा) का जगतकारणत्व और अन्य अवतारों के कारणत्व का प्रतिपादन है!

रूद्र शिव और परब्रह्म श्रीराम में साम्यता है, दोनों कपर्दिन (जटाधारी) हैं, दोनों गिरिशन्त (पर्वत पर रहने वाले) हैं, भगवान् रूद्र कैलास पर और भगवान् श्रीराम चित्रकूट पर विहार करने वाले हैं। भगवान् रूद्र पशुपति हैं, भगवान् श्रीराम समस्त देव, नर, वानरों, ऋक्षों, पक्षियों, इत्यादि समस्त जीवों के परमपति एवं इष्टदेव हैं। श्रुति द्विभुज रूद्र से वस्तुतः परब्रह्म श्रीराम का ही प्रतिपादन करती है।

श्रीकृष्ण -

हर प्रकार से भगवान् श्रीराम और भगवान् श्रीकृष्ण एक ही हैं, वस्तुतः परब्रह्म श्रीराम के हीं श्रृंगारी-रूपावतार भगवान् श्रीकृष्ण हैं —

कृष्णो वै परमं दैवतम् ।
परं ब्रह्म कृष्णात्मको नित्यानन्दैक्यस्वरूपः सोऽहम् ।
(~गोपालतापिन्युपनिषत्)

“श्रीकृष्ण ही परमदेव हैं।
परब्रह्म श्रीकृष्ण रूपात्मक हैं।”

वह परब्रह्म स्वयं में कौन हैं, तब?

गोपालतापिन्युपनिषत् में साथ में यह भी कहा गया है कि पूर्व में एक नारायण देव थे जिनमें सारा संसार ओतप्रोत था - (एको) हि वै पूर्वं नारायणो यस्मिंल्लोका ओताश्च प्रोताश्च ।

सुमेरु पर्वत पर विद्यमान अवतार मूर्तियों में गोपाल ही सर्वश्रेष्ठ अवतार हैं।

श्रीनारायण -

एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नापो नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यो न चन्द्रमाः ।
(~ महोपनिषद्, नारायणोपनिषद्)

“प्रारंभ में केवल एक देव श्रीमान् नारायण ही थे, न ब्रह्मा थे और न ईशान शिव, न जल था, न अग्नि, न आकाश था, न पृथ्वी, न नक्षत्र थे, न सूर्य और न ही चन्द्रमा।”

यहाँ शूलपाणि शिव से श्रीमान् नारायण की पहले की विद्यमानता कही गयी है, इससे रूद्र (शूलपाणि शिव) का मूल-परब्रह्मत्व बाधित होता है।

परन्तु, क्या श्रीमान् नारायण द्विभुज सत्य-पुरुष (सनातन-परब्रह्म) श्रीराम से भी पूर्व से विद्यमान हैं? नहीं, यहाँ नारायण की अन्य से पूर्व विद्यमानता कही गयी है, श्रीराम से पूर्व विद्यमानता श्रुति नहीं कहती! तब ऐसा क्यूँ कहा गया कि एक नारायण ही थे? नारायण का स्वयं परब्रह्म श्रीराम से ऐक्य (साम्य) होने के कारण हीं श्रुति ऐसा कहती है कि पूर्व में केवल एक नारायण ही थे। महोपनिषद् के मङ्गलाचरण में भी कहा गया है — यन्महोपनिषद्वेद्यं चिदाकाशतया स्थितम् । परमाद्वैतसाम्राज्यं तद्रामब्रह्म मे गतिः ॥ - महोपनिषद् से जाने जासकने वाले परव्योम-अद्वितीय-साम्राज्य चिदाकाश (परमचैतन्य त्रिपाद्विभूति) में स्थित उस राम कहाने वाले परब्रह्म में मेरी मति (भक्ति) हो।

रूप विशेष चतुर्भुज नारायण द्विभुज ‘नर’ रूपी सनातन-परमात्मा (नरतीति नरः प्रोक्तः परमात्मा सनातनः) से हीं उत्पन्न होते हैं, ऐसा सर्वत्र कहा गया है।

श्रीराम -

रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥ ६॥
चिन्मयस्याद्वितीयस्य निष्कलस्याशरीरिणः ।
उपासकानां कार्यार्थं ब्रह्मणो रूपकल्पना ॥ ७॥
(श्रीरामतापिन्युपनिषत् १.६-७)

“जिस अनन्त नित्य आनन्द-स्वरूप चिन्मय परमात्म तत्त्व में योगीजन रमण करते हैं, वह परब्रह्म इस ‘राम’ नाम (शब्द) से अभिधावृत्ति से कहे जाते है। वह (राम कहाने वाले परब्रह्म) निष्कल चिन्मय और अद्वितीय शरीर वाले हैं (निष्कलस्याशरीरिणः), और वही परब्रह्म श्रीराम (भिन्न-भिन्न) उपासकों के [उपासकानां] प्रीति-अभिरुचि के लिए रूप-कल्पना (श्रीकृष्ण-नारायण-विष्णु आदि रूप धारण) करते हैं। वे ही द्विभुज (श्रीकृष्ण), चतुर्भुज (नारायण), अष्टभुज (भूमा-विष्णु) से लेकर सहस्र-भुजाओं वाले रूपों को धारण करने वाले हैं।”

अर्थात्, राम नाम वाले स्वयं परब्रह्म हैं, वह स्वयं परब्रह्म श्रीराम अद्वितीय चिन्मय शरीर वाले है!

यदि अन्य श्री नारायण/विष्णु आदि ने श्रीराम का अवतार लिया होता, तो यहाँ श्रुति कहती कि परब्रह्म अभिधावृत्ति से विष्णु/नारायण नाम से कहे जाते हैं, परन्तु ऐसा न कहकर, श्रुति ने यह कहा कि परब्रह्म अभिधावृत्ति से राम कहे जाते हैं, अर्थात् जो त्रिपाद्विभूति में जो स्वयं-परब्रह्म हैं, वो मूल-रूप में द्विभुज श्रीराम हैं, वे चिन्मय शरीर वाले, निष्कल, और [विष्णु के भी विष्णु] महाव्यापी (त्रिपाद्विभूति को भी व्यापने वाले) हैं!

श्रीराम ही परम-प्राप्य तत्त्व हैं, जिनमें सभी रमण करना चाहते हैं! परमरस-स्वरूप हैं जिसे पाकर जीव आनन्दी हो जाता है।

    आगे श्रुति कहती भी है कि पूर्व में जब सहस्रों-मन्वन्तरों तक शिव ने श्रीराम की आराधना की, तब जाकर उन्हें भगवान् श्रीराम का साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ। सत्यलोक में भी ब्रह्मा को श्रीरामचन्द्र ने मन्त्रराज का रहस्य प्रदान किया था (पूर्वं सत्यलोके श्रीरामचन्द्रेणैवं शिक्षितो ब्रह्मा पुनरेतया गाथया नमस्करोति ॥), इससे प्रारंभ से हीं श्रीराम की नित्य-विद्यमानता श्रुति सिद्ध करती है।


श्रीराम का सर्वावतारीत्व

  श्रुति कहती है कि ‘ब्राह्मणो रूपकल्पना’ अर्थात् श्रीराम कहाने वाले परब्रह्म में सर्वावतारीत्व है, वे अनेक रूपों को धारण (कल्पना) करने वाले हैं —

नारायणं नारसिंहं वासुदेवं वाराहं.. एतानि रामस्याङ्गानि जानीथाः।
राम एव परं ब्रह्म।
(श्रीरामरहस्योपनिषद्)

विष्णुभक्त-योगी-ऋषि-मुनियों, प्रह्लाद आदि द्वारा परमतत्त्व संबन्धी जिज्ञासा (अथातो ब्रह्म जिज्ञासा) करने पर सर्वरहस्यविद् परमभागवत हनुमान जी उनको उपदेश करते हुए कहते हैं —

“ श्रीनारायण, श्रीनरसिंह, श्रीवासुदेव (श्रीकृष्ण), श्रीवाराहदेव, इत्यादि ये सभी भगवान् श्रीराम के अंग (अंश) हैं, ऐसा जानिये। एकमात्र श्रीराम ही परब्रह्म (अर्थात् सर्वावतारी स्वयं-परब्रह्म) हैं।”

इस प्रकार श्रीमान् नारायण भी परब्रह्म श्रीमान् रघुनाथ जी के अवतार ही हैं, श्रीराम में ही सर्वावतारीत्व है, अन्य किसी में नहीं। इसलिए, अगस्त्य-संहिता में भी कहा गया है कि ‘सर्वेषां अवताराणां अवतारी रघुत्तमः’ — सभी अवतारों के अवतारी श्रीरघुनाथ जी ही हैं।

भगवान् श्रीराम के सर्वावतारीत्व के संबन्ध में वेदावतार श्रीवाल्मीकि रामायण भी परम-प्रमाण स्वरूप है —

भवान्नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ॥
एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित् ।
(श्रीवाल्मीकि रामायण ६.११७.१३)

ब्रह्मा जी कहते हैं —
“हे श्रीराम! आप ही चक्रधारण करने वाले प्रभु नारायण देव, और एकशृङ्ग वाले वराहदेव हैं, आप भूत और भविष्य के (सभी अवतारों को ग्रहण कर) अपने सभी शत्रुओं को जितने वाले हैं।”

सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण ६.११७.२८)

ब्रह्मा जी कहते हैं —
“हे श्रीराम! सीताजी लक्ष्मी (राधा, रुक्मिणी, सरस्वती) हैं, और आप श्रीविष्णु, श्रीकृष्ण, और प्रजापति ब्रह्मा हैं!”

(श्रीकृष्ण के साहचर्य से राधा, रुक्मिणी का अर्थ है!)

परन्तु श्रीराम स्वयं कौन हैं? तो ब्रह्मा कहते हैं “आप स्वयम्प्रभु (अर्थात् सर्वावतारी मूल-परब्रह्म) हैं! वस्तुतः आप ही आदि, मध्य और अन्त में दिखने वाले अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म हैं।”

श्रीराम का श्रीमन्नारायण अवतार —

संक्षिप्य हि पुरा लोकान मायया स्वयमेव हि ।
महार्णवे शयानोऽपसु मां त्वं पूर्वजीजनः ॥
(श्री वाल्मीकि रामायण ७.१०४.४)

स्वयं काल भगवान् श्रीराम के प्रति उनसे ब्रह्मा जी के वचन कहते हैं —
“हे श्रीराम! आपने ही अपनी इच्छा-मात्र (माया) से सम्पूर्ण लोकों का (अपने अन्दर) विलय कर महार्णव में (कारणार्णव में कारणजलशायी-नारायण के रूप में) सोए थे।”

अर्थात, श्रीनारायण रूप के पूर्व भी परब्रह्म ‘श्रीराम’ ही थें, जिन्होंने नारायण रूप से कारणार्णव के जल पर शयन किया था। समस्तलोक कारणजलशायी-नारायण के अन्दर संक्षिप्त बिन्दु (साम्य) रूप में रहते हैं,

श्रीराम का विष्णु अवतार —

ततस्त्वमसि दुर्धर्षात्तस्माद् भावात् सनातनात्।
रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वं उपजग्मिवान् ॥
(श्रीवाल्मीकि रामायण ७.१०४.९)

काल श्रीराम से आगे कहता हैं —
“हे श्रीराम! आपने हीं सृष्टि के प्रारंभ में अपने सनातन भाव (द्विभुज साकेताधीश रूप) को त्यागकर समस्त जीवों की रक्षा (पालन) के लिए विष्णु रूप को धारण किया था।”

रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय ।
इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दशेति ॥
(ऋग्वेद ६.४७.१८, बृहदारण्यकोपनिषत् २.५.१९)

“देदीप्यमान परमात्मा परव्योम-कोसल के इन्द्र (कोसलेन्द्र) श्रीराम अनेक प्रतिरूप (अपने सदृश अनेक रूपों) वाले हो गए [रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव]। उन्हीं श्रीराम ने अपनी योग-माया (अनन्त शक्तियों) से अनेकों पुरुषावतार ग्रहण किया है। वे इस प्रपञ्च में (ह्यस्य) अनन्त किरणों [अथवा हरयः अर्थात् अनेकों विष्णुओं] (हरयः दशेति शता) से परिवेष्टित [युक्त] हैं।"

‘ञिइन्धी दीप्तौ’ इस धातु से दीप्ति गुण वाले के अर्थ में ‘इन्ध’ शब्द से इन्द्र शब्द की निष्पत्ति होती है, और ‘राजृ दीप्तौ’ धातु से अतिशय देदीप्यमान (यो राजते ~ श्रुति) के अर्थ में ‘राम’ शब्द है! ‘इरां ददाति’ दानार्थक ‘डुदाञ्’ धातु से ‘इन्द्र’ शब्द बनता है, ‘राति ददाति’ दानार्थक ‘रा’ धातु से भक्तों को उनके सभी मनोवाञ्छित वर भुक्ति-मुक्ति-भक्ति देने वाले परब्रह्म के अर्थ में ‘राम’ शब्द है! ‘इदी परमैश्वर्ये’ से परम-ऐश्वर्यवान् के अर्थ में ‘इन्द्र’ शब्द बनता है, और परम-ऐश्वर्यवान् श्रीराम सम्पूर्ण लोकों के राजा हैं, इस प्रकार ‘इन्द्र’ और ‘राम’ शब्द दोनों पर्यायवाची हैं, इन्द्र शब्द के परम वाच्य सीतापति श्रीराम हीं हैं, अतः भगवान् श्रीराम को रामायण में ‘कोसलेन्द्र’ (~वाल्मीकीये) - कोसल के इन्द्र कहा गया है, जिनका नाम ‘इन्द्र’ - देवताओं में इन्द्र नाम के देवता ग्रहण करते हैं। वैसे ही सर्वव्यापक होने से श्रीराम ‘विष्णु’ कहे जाते हैं, और वे चतुर्भुज-अष्टभुज आदि अनन्त विष्णु स्वरूपों के मूल-कारण हैं। विशेष पढने के लिए ‘भगवान् श्रीराम और भगवान् श्रीविष्णु’ शीर्षक के अन्तर्गत पढ़ें।


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॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥